एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट व्याख्या अपमान बनाम अत्याचार: नीयत, संदर्भ और कानून की सीमा रेखा खींचता फैसला

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 20 जनवरी

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि सिर्फ अपमानजनक या अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल अपने आप में एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता, जब तक यह किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित या डराने की मंशा से न किया गया हो।जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आलोक अराधे की पीठ ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले में की, जिसमें निचली अदालत और उच्च न्यायालय द्वारा एससी/एसटी एक्ट के तहत आपराधिक कार्यवाही जारी रखने को कानूनी भूल करार दिया गया। अदालत ने अपीलकर्ता केशव महतो उर्फ केशव कुमार महतो के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—“केवल यह तथ्य कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है, अपने आप में एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”पीठ ने जोर देकर कहा कि इस कानून की धारा 3(1)(आर) के तहत अपराध साबित करने के लिए दो अनिवार्य शर्तों का पूरा होना आवश्यक है—शिकायतकर्ता का अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य होना, औरआरोपी द्वारा किया गया अपमान या धमकी शिकायतकर्ता की जाति के कारण और उसी उद्देश्य से की गई हो।अदालत ने कहा कि यदि अपमान या विवाद व्यक्तिगत रंजिश, तात्कालिक गुस्से या सामान्य झगड़े का परिणाम है और उसमें जाति को निशाना बनाने की नीयत नहीं है, तो उसे एससी/एसटी एक्ट के दायरे में नहीं लाया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बिहार से जुड़ा है, जहां अपीलकर्ता केशव कुमार महतो के खिलाफ एक आंगनवाड़ी केंद्र में कथित गाली-गलौज और मारपीट को लेकर प्राथमिकी दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि घटना के दौरान जाति-आधारित अपमान हुआ।ट्रायल कोर्ट ने मामले में समन जारी किया, जिसे पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हालांकि, हाईकोर्ट ने 15 फरवरी 2025 के अपने आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया और कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दे दी।इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने रिकॉर्ड का गहन परीक्षण किया और पाया कि—न तो प्राथमिकी में,और न ही आरोपपत्र मेंजाति-आधारित अपमान या धमकी के ठोस और विशिष्ट आरोप मौजूद हैं।इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के आदेशों को गलत ठहराते हुए कार्यवाही रद्द कर दी।

कानून की मंशा पर अदालत की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी दोहराया कि एससी/एसटी एक्ट का उद्देश्य अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को वास्तविक अत्याचारों से सुरक्षा देना है, न कि हर प्रकार के विवाद को इस कठोर कानून के दायरे में लाना।पीठ ने कहा—“यह अधिनियम सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ एक ढाल है, लेकिन इसे ऐसा हथियार नहीं बनने दिया जा सकता, जिससे बिना आवश्यक कानूनी तत्वों के किसी को आपराधिक मुकदमे में घसीटा जाए।”

कानूनी और सामाजिक महत्व

कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला देश भर की निचली अदालतों और पुलिस के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत का काम करेगा। इससे यह स्पष्ट होगा कि—केवल कठोर भाषा या झगड़ा होना पर्याप्त नहीं,बल्कि जाति को लक्ष्य बनाकर अपमान करने की नीयत साबित करना अनिवार्य है।साथ ही, अदालत ने यह संतुलन भी साधा कि कानून का दुरुपयोग रोका जाए, लेकिन वास्तविक पीड़ितों की सुरक्षा कमजोर न पड़े।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण स्पष्टता लेकर आया है। यह निर्णय एक ओर जहां अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के अधिकारों की रक्षा के मूल उद्देश्य को दोहराता है, वहीं दूसरी ओर कानून के अंधाधुंध प्रयोग और संभावित दुरुपयोग पर भी रोक लगाने की दिशा दिखाता है।संक्षेप में, शीर्ष अदालत ने यह संदेश दिया है कि—

अपमान अपराध तब बनेगा, जब उसके पीछे जाति को नीचा दिखाने की नीयत हो।यही कानून, न्याय और सामाजिक संतुलन—तीनों की साझा कसौटी

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