India–EU Free Trade Agreement :‘ Mother Of All Deals’ या बदलती विश्व-व्यवस्था में भारत का निर्णायक दांव?

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 23 जनवरी

26 जनवरी… गणतंत्र दिवस का मंच।लाल किले से संविधान की आत्मा गूंजती है और उसी दिन, पर्दे के पीछे दुनिया की सबसे बड़ी जियो-इकोनॉमिक शतरंज पर एक निर्णायक चाल चलने की तैयारी है। भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच प्रस्तावित Free Trade Agreement (FTA) को वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने यूं ही “Mother Of All Deals” नहीं कहा है। यह सिर्फ व्यापार का समझौता नहीं, बल्कि विश्व शक्ति-संतुलन के पुनर्लेखन की शुरुआत मानी जा रही है।पूर्व राजनयिक दीपक वोहरा के शब्दों में यह डील “काग़ज़ी समझौते से कहीं ज़्यादा, आने वाले वर्ल्ड ऑर्डर की झलक” है।क्यों भारत? क्यों अब?राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यूरोप आज रणनीतिक अनाथता (Strategic Orphanhood) के दौर से गुजर रहा है।अमेरिका: “अब हर लड़ाई तुम्हारी अपनी है”रूस: यूक्रेन युद्ध के बाद दरवाज़ा खुद बंदचीन: भरोसे के काबिल नहींNATO: अमेरिका के बिना खोखलाऐसे में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो

बड़ा बाज़ार है

राजनीतिक रूप से स्थिर है

किसी सैन्य गुट का गुलाम नहीं

और जिसकी नीति है – Sovereign Autonomyयही वजह है कि 20 साल से लटकी यह डील अब अचानक “अति-आवश्यक” बन गई है।‘Mother Of All Deals’ क्यों?इस डील का महत्व सिर्फ इसके आकार में नहीं, बल्कि इसके भू-राजनीतिक वजन में है।

27 देशों के साथ एक साथ समझौतायह भारत का पहला ऐसा FTA होगा जिसमें वह पूरे यूरोपियन यूनियन से एक साथ समझौता करेगा। यानी 45 करोड़ से ज्यादा की हाई-इनकम आबादी तक सीधी पहुंच।

वैश्विक सप्लाई चेन का पुनर्संतुलनचीन से दूरी बना रहा यूरोप अब भारत कोवैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग हबभरोसेमंद सप्लाई पार्टनरऔर भविष्य का बाज़ारमान रहा है।

अमेरिका–चीन को स्पष्ट संदेशयह डील बताती है कि भारत अब“डील लेने वाला नहीं, डील तय करने वाला देश”बन चुका है।भारतीय उद्योगपति क्या सोचते हैं?CII, FICCI और ASSOCHAM का साझा स्वरभारतीय उद्योग संगठनों का मानना है कि यह समझौता—

फार्मा, IT, ऑटो, टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग सेक्टर को नया जीवन देगा

यूरोप में भारतीय कंपनियों को रेगुलेटरी आसानियाँ मिलेंगी

MSMEs को हाई-वैल्यू मार्केट मिलेगा लेकिन चेतावनी भी साफ है।“अगर सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन में ढील हुई,तो चीनी कंपनियां यूरोप के रास्ते भारत में घुसेंगी।”टाटा, महिंद्रा, इंफोसिस जैसे बड़े समूह जहां इसे अवसर मानते हैं, वहीं लघु उद्योग संगठन चाहते हैं कि ड्यूटी कटौती चरणबद्ध हो, ताकि घरेलू उद्योग कुचले न जाएं।

विपक्षी दलों की आपत्तियाँ

कांग्रेस, वाम दल और कुछ क्षेत्रीय पार्टियों ने सवाल उठाए हैं—क्या यूरोपीय कृषि उत्पाद भारतीय किसानों को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे?क्या डेटा प्रोटेक्शन और लेबर लॉ पर यूरोप की शर्तें भारत की संप्रभुता से टकराएँगी?

क्या यह डील बड़े कॉरपोरेट्स के लिए है या आम जनता के लिए?कांग्रेस का कहना है कि“सरकार को उत्साह से ज़्यादा सतर्कता दिखानी चाहिए,FTA का इतिहास भारत के लिए हमेशा एकतरफा नहीं रहा।”सरकार का पक्ष: ‘अनुभव से सीखकर आगे बढ़े भारत’सरकारी सूत्रों और नीति आयोग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है—ASEAN और अन्य FTAs से मिले सबक इस डील में लागू होंगे हर सेक्टर के लिए Review Clause होगा संवेदनशील क्षेत्रों को पूरी सुरक्षा दी जाएगी

सरकार का साफ संदेश है—“अब भारत बिना शर्त बाज़ार नहीं खोलता।”रक्षा विशेषज्ञों की राय: व्यापार हाँ, सुरक्षा नहींरक्षा विशेषज्ञ एक स्वर में कहते हैं—भारत यूरोप की सुरक्षा का ठेकेदार नहीं बनेगा न भारतीय सैनिक यूरोपीय युद्धों में जाएंगे यह साझेदारी आर्थिक और तकनीकी होगी, सैन्य नहीं

एक वरिष्ठ सैन्य विश्लेषक के शब्दों में—“भारत अब गुलाम भारत नहीं है।हम व्यापार करेंगे, मध्यस्थ बन सकते हैं,लेकिन किसी की जंग नहीं लड़ेंगे।”

आम भारतीय को क्या मिलेगा?

रोजगार के नए अवसर

यूरोप में स्किल्ड भारतीय युवाओं की मांग

बेहतर टेक्नोलॉजी और निवेश

सस्ती और बेहतर क्वालिटी की वस्तुएँ लेकिन साथ ही—

घरेलू उद्योग की सुरक्षा

चीनी घुसपैठ पर कड़ी निगरानी

किसानों और MSMEs के हितों की रक्षा— ये तीन शर्तें निर्णायक होंगी।

निष्कर्ष:

सौदा नहीं, संकेत हैIndia–EU FTA को सिर्फ व्यापार के चश्मे से देखना भूल होगी।यह समझौता दरअसल—यूरोप की मजबूरीभारत की मजबूतीऔर बदलती वैश्विक राजनीति का आईनाहै।आज दुनिया मल्टी-पोलर होने का दावा करती है,लेकिन भारत पहली बार उस ध्रुवों के बीच संतुलन तय कर रहा है।यही वजह है कि इसे कहा जा रहा है—

‘Mother Of All Deals’

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