यूजीसी इक्विटी नियमों पर नई बहस: सवर्ण होकर समर्थन में उतरे गुरु रहमान, तेज हुई सियासी और बौद्धिक टकराहट

बी के झा

पटना/नई दिल्ली, 27 जनवरी

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए इक्विटी (समानता) नियम देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बड़े सामाजिक-राजनीतिक मंथन के केंद्र में आ गए हैं। जहां एक ओर सवर्ण वर्ग का बड़ा हिस्सा इन नियमों को “भेदभाव को बढ़ावा देने वाला” बता रहा है, वहीं पटना के चर्चित कोचिंग शिक्षक गुरु रहमान का समर्थन इस बहस को एक नई दिशा दे गया है।गुरु रहमान का यह बयान— “मैं खुद सवर्ण हूं, लेकिन विश्वविद्यालयों में मैंने जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव होते देखा है”— न सिर्फ सवर्ण समाज के भीतर वैचारिक विभाजन को उजागर करता है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या समानता के लिए डर का वातावरण ज़रूरी है?

गुरु रहमान का तर्क: भय से आएगी समानता?

आज तक से बातचीत में गुरु रहमान ने कहा कि यूजीसी के नए नियम इसलिए आवश्यक हैं क्योंकि“जब तक लोगों के मन में भय नहीं रहेगा, तब तक वे कमजोर वर्गों के खिलाफ बोलते रहेंगे। जब बोलना बंद होगा, तभी वास्तविक समानता आएगी।”उन्होंने इस फैसले को “ऐतिहासिक” बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार भी जताया। रहमान का मानना है कि सवर्ण समाज का विरोध इस प्रक्रिया को रोक नहीं सकता।सवर्ण समाज में आक्रोश, विरोधाभासों के आरोप हालांकि गुरु रहमान का यह रुख सवर्ण समाज के एक बड़े हिस्से को नागवार गुज़रा है। खासकर बिहार के ब्राह्मण समाज और कोचिंग जगत से जुड़े कई शिक्षाविदों ने उनके बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।

एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,“मोतीउर रहमान (गुरु रहमान) पहले से ही अपने कोचिंग संस्थान में सवर्ण छात्रों के प्रवेश को लेकर भेदभाव करते रहे हैं। ऐसे में खुद को सवर्ण बताकर समानता की दुहाई देना विरोधाभासी है।”कुछ समाजसेवियों ने यहां तक सवाल उठाया कि “अगर वे वास्तव में सवर्ण हैं, तो यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं किया गया?”

इस बयान के बाद पटना और आसपास के इलाकों में सवर्ण युवाओं और कोचिंग छात्रों के बीच भारी नाराज़गी देखी गई।

कानूनविदों की राय: नियम सही, लेकिन दुरुपयोग की आशंका

संवैधानिक और शिक्षा कानून के विशेषज्ञों का मानना है कि यूजीसी के इक्विटी नियम संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 की भावना के अनुरूप हैं, लेकिन इनके क्रियान्वयन में संतुलन बेहद ज़रूरी है। वरिष्ठ कानूनविद् प्रो. (डॉ.) अरुण मिश्र कहते हैं,“भेदभाव रोकने के लिए संस्थागत तंत्र आवश्यक है, लेकिन यदि शिकायतों की जांच पारदर्शी नहीं होगी, तो यह कानून हथियार भी बन सकता है।”यही कारण है कि जनरल कैटेगरी के छात्र-छात्राओं को नियमों के संभावित दुरुपयोग की आशंका सता रही है। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी दाखिल की जा चुकी है।

विपक्षी दलों का हमला: सरकार समाज को बांट रही है

विपक्षी दलों ने इस पूरे विवाद को लेकर केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला है।राजद और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार बिना व्यापक संवाद के ऐसे नियम लाकर समाज को “जातीय खांचों में और गहरा” कर रही है।राजद के एक वरिष्ठ नेता ने कहा,“शिक्षा में समानता ज़रूरी है, लेकिन डर और दंड के जरिए नहीं, बल्कि संवाद और सुधार के जरिए।”

इस्तीफों से बढ़ा राजनीतिक तापमान

इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश में एक भाजपा नेता और एक अधिकारी के इस्तीफे ने विवाद को और तीखा कर दिया है। सवर्ण संगठनों का कहना है कि यह नियम “सामूहिक रूप से एक वर्ग को संदेह के कटघरे में खड़ा करता है।”

निष्कर्ष:

समानता बनाम असुरक्षा की जंग

यूजीसी के नए इक्विटी नियम अब केवल शिक्षा नीति नहीं रहे, बल्कि सामाजिक विश्वास, सत्ता और पहचान की बहस बन चुके हैं। गुरु रहमान जैसे शिक्षक जहां इसे ऐतिहासिक सुधार बता रहे हैं, वहीं सवर्ण समाज का बड़ा तबका इसे अपने खिलाफ संस्थागत अविश्वास के रूप में देख रहा है।सवाल यह नहीं है कि समानता चाहिए या नहीं—

सवाल यह है कि क्या समानता भय से आएगी, या भरोसे से?यह बहस अभी थमी नहीं है।

आने वाले दिनों में अदालत, सड़कों और कक्षाओं—तीनों जगह इसका असर दिखना तय है।

NSK

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