बी के झा
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बारामती /मुंबई/ नई दिल्ली, 28 जनवरी —
एक युग, एक प्रयोग और एक अंत“हयात ले के चलो, कायनात ले के चलोचलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो”— मख़दूम मुहिउद्दीन28 जून 2024 को महाराष्ट्र विधानसभा के बजट सत्र में पढ़ा गया यह शेर केवल एक साहित्यिक क्षण नहीं था, बल्कि वह अजित पवार की पूरी राजनीतिक जीवन-यात्रा का सार था। सत्ता के गलियारों में जिनका क़दम कभी रुका नहीं, जिनकी चाल को समझ पाना मित्रों और विरोधियों—दोनों के लिए कठिन रहा, वही अजित पवार 28 जनवरी को एक विमान हादसे में असमय इतिहास बन गए।उनकी मृत्यु केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सत्ता-राजनीति के सबसे जटिल अध्याय की समाप्ति मानी जा रही है।
परिवार से सत्ता तक: राजनीति की पाठशाला
अजित पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को अहमदनगर ज़िले के देओलाली प्रवरा में हुआ। वे अनंतराव पवार के पुत्र और शरद पवार के भतीजे थे—और यही रिश्ता उनके जीवन की सबसे बड़ी ताक़त भी बना और सबसे बड़ा विवाद भी।राजनीतिक शिक्षाविद प्रो. माधव देशमुख लिखते हैं,“अजित पवार उस पीढ़ी के नेता थे जिन्होंने विचारधारा नहीं, बल्कि राजनीतिक यथार्थवाद को अपना गुरुमंत्र बनाया।
”बारामती की राजनीति में पले-बढ़े अजित पवार ने चाचा शरद पवार के सान्निध्य में सत्ता के हर रंग को क़रीब से देखा। सहकारी संस्थाओं से लेकर संसद तक उनका सफ़र ग्रासरूट राजनीति का क्लासिक उदाहरण था।
सीट छोड़ने से सत्ता साधने तक1991 में बारामती से सांसद चुने जाने के बाद अजित पवार ने जिस तरह अपने चाचा शरद पवार के लिए सीट छोड़ी, वह भारतीय राजनीति में आज भी निष्ठा और रणनीति—दोनों का प्रतीक माना जाता है।लेकिन यहीं से यह भी साफ़ हो गया था कि अजित पवार त्याग करना जानते हैं, पर स्थायी रूप से पीछे रहना नहीं।
वरिष्ठ पत्रकार श्रीमंत माने के शब्दों में,“अजित पवार कभी सत्ता के दावेदार कम नहीं रहे, बस समय और परिस्थिति उनके पक्ष में नहीं आई।”
मुख्यमंत्री जो बनते-बनते रह गए2004 महाराष्ट्र की राजनीति का वह मोड़ था, जब अजित पवार मुख्यमंत्री बन सकते थे। कांग्रेस–एनसीपी फ़ॉर्मूले में एनसीपी का दावा मज़बूत था, लेकिन शरद पवार की राष्ट्रीय राजनीति और कांग्रेस के आंतरिक समीकरणों ने यह अवसर छीन लिया।
क़ानूनविद और संवैधानिक विशेषज्ञ एडवोकेट मिलिंद साठे मानते हैं,
“यह घटना दिखाती है कि भारत में संवैधानिक पदों से ज़्यादा महत्व गठबंधन गणित का होता है।”छह बार उप मुख्यमंत्री: एक रिकॉर्ड, एक संकेतअजित पवार का छह बार उप मुख्यमंत्री बनना महज़ संयोग नहीं था। यह दर्शाता है कि वेसत्ता के लिए अपरिहार्य थे हर गठबंधन के लिए उपयोगी थे और हर सरकार के लिए मैनेजमेंट मैन थेबीजेपी, कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव), शिवसेना (शिंदे)—हर किसी के साथ उनका राजनीतिक सह-अस्तित्व रहा।
राजनीतिक विश्लेषक सुधीर सूर्यवंशी लिखते हैं,“
अजित पवार सत्ता के केंद्र में रहने के लिए विचारधारा नहीं, बल्कि सामर्थ्य बेचते थे।”2023 का विद्रोह: परिवार बनाम भविष्य2 जुलाई 2023 को एनसीपी का विभाजन केवल पार्टी टूटना नहीं था, बल्कि भारतीय राजनीति में पारिवारिक दलों की आत्मा पर सवाल था।
अजित पवार ने शरद पवार से अलग होकर पार्टी चुनाव चिह्नऔर सत्ताअपने नाम की।
विपक्षी दलों ने इसे राजनीतिक अवसरवाद कहा, जबकि महायुति ने इसे स्थिरता की राजनीति बताया।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शोक संदेश में कहा,“
अजित पवार से वैचारिक मतभेद रहे, लेकिन वे राजनीति की जटिलताओं को समझने वाले नेता थे।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा,“
अजित पवार ने महाराष्ट्र के विकास में अहम भूमिका निभाई।”
ख़ून गाढ़ा था, राजनीति पतली सबसे दिलचस्प तथ्य यह रहा कि राजनीतिक अलगाव के बावजूद पारिवारिक रिश्ते नहीं टूटे सार्वजनिक कार्यक्रमों में साथ दिखे और स्थानीय चुनावों में अप्रत्यक्ष सहयोग भी रहा यह भारतीय राजनीति का वह सच है, जहाँ दल बदल सकते हैं, रिश्ते नहीं।
मौत और उसके बाद का अर्थ
अजित पवार की मृत्यु पर राष्ट्रपति से लेकर वाम दलों तक का शोक जताना इस बात का प्रमाण है कि वे विवादित लेकिन अनदेखे नहीं किए जा सकने वाले नेता थे।
महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें प्रशासनिक दक्षता का प्रतीक बताया, वहीं विपक्ष ने कहा कि“उनका जीवन भारतीय राजनीति की नैतिक दुविधाओं का आईना है।
निष्कर्ष:
अजित पवार क्या थे?
अजित पवारन पूर्ण आदर्शवादी थे न पूर्ण अवसरवादी वे भारतीय राजनीति के यथार्थवादी अध्याय थे वे उस पीढ़ी के नेता थे जिन्होंने यह साबित किया कि भारत में सत्ता केवल विचार से नहीं, समय, परिवार और परिस्थिति से बनती है।
उनकी राजनीति पर बहस जारी रहेगी,लेकिन उनकी अनुपस्थिति महाराष्ट्र की राजनीति में एक ऐसा शून्य छोड़ गई है,
जिसे भर पाना आसान नहीं होगा।
