रूसी तेल बनाम रणनीतिक साझेदारी? भारत-अमेरिका रिश्तों की अग्निपरीक्षा और ‘फादर ऑफ ऑल डील्स’ की राह

बी के झा

NSK

नई दिल्ली / वॉशिंगटन, 1 फरवरी

क्या रूसी तेल की खरीद ने भारत-अमेरिका संबंधों में दरार डाली है? या यह केवल कूटनीतिक शोर है, जिसके पीछे रणनीतिक साझेदारी पहले से अधिक मजबूत हो रही है?

इन सवालों के बीच केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल का बयान रिश्तों में स्थिरता का संकेत देता है। उन्होंने साफ कहा है कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) को लेकर बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और निकट भविष्य में इस मोर्चे पर “अच्छी खबर” मिल सकती है।पीटीआई-भाषा को दिए साक्षात्कार में गोयल ने कहा—“हर मुक्त व्यापार समझौता अपनी शर्तों और खूबियों पर टिका होता है। हमारी बातचीत बहुत अच्छी चल रही है।

अमेरिका में मेरे समकक्ष के साथ न केवल शानदार कामकाजी संबंध हैं, बल्कि व्यक्तिगत मित्रता भी है।

”‘फादर ऑफ ऑल डील्स’: कब बनेगी हकीकत?

भारत-ईयू के प्रस्तावित एफटीए को जहां ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जा रहा है, वहीं भारत-अमेरिका समझौते को राजनीतिक गलियारों में ‘फादर ऑफ ऑल डील्स’ का नाम दिया जाने लगा है। इस पर समयसीमा पूछे जाने पर गोयल ने दो टूक कहा कि व्यापार समझौते कभी डेडलाइन पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों पर तय होते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बयान संकेत देता है कि भारत—जल्दबाजी में रियायतें देने के बजाय संतुलित और दीर्घकालिक समझौता चाहता है।

रूसी तेल: टकराव या यथार्थवादी कूटनीति?

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद पर अमेरिका और यूरोप में असहजता दिखी थी। लेकिन पीयूष गोयल ने इस आशंका को खारिज करते हुए कहा—“मुझे नहीं लगता कि यह कोई बाधा है। कुछ गलतफहमियां हो सकती थीं, जिन्हें काफी हद तक सुलझा लिया गया है।”भू-राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भारत की नीति रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है—ऊर्जा सुरक्षा भारत की प्राथमिकता हैऔर सस्ता तेल अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी

वहीं अमेरिका अब यह भी समझ रहा है कि भारत को किसी एक खांचे में नहीं बांधा जा सकता।

जयशंकर का अमेरिका दौरा: बड़े संकेत

अगले सप्ताह विदेश मंत्री एस. जयशंकर का वॉशिंगटन दौरा इस संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है। यात्रा से पहले उन्होंने अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के साथ—व्यापार महत्वपूर्ण खनिजऔर रक्षा सहयोग पर विस्तृत चर्चा की है। संभावना है कि जयशंकर, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से भी मुलाकात करेंगे।

अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह दौरा—व्यापार समझौतेऔर इंडो-पैसिफिक रणनीति दोनों के लिए निर्णायक हो सकता है।

रक्षा विशेषज्ञ: व्यापार से आगे रणनीति

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक भारत-अमेरिका संबंध अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। क्वाड रक्षा तकनीकऔर इंडो-पैसिफिक में चीन की चुनौती इन रिश्तों को रणनीतिक गहराई देते हैं।उनके अनुसार, रूसी तेल जैसे मुद्दे रणनीतिक साझेदारी को पटरी से उतारने की क्षमता नहीं रखते।

कानूनविदों की राय: प्रतिबंध बनाम अंतरराष्ट्रीय कानून

कानून विशेषज्ञ मानते हैं कि—भारत पर किसी तीसरे देश की ऊर्जा नीति थोपना अंतरराष्ट्रीय कानून और WTO की भावना के खिलाफ होगा।भारत ने अब तक किसी भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध व्यवस्था का उल्लंघन नहीं किया है।

शिक्षाविद: बहुध्रुवीय दुनिया में भारत की भूमिका

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शिक्षाविदों के अनुसार, भारत आज बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में—सेतु की भूमिका निभा रहा हैं न कि किसी गुट का अनुयायी बन रहा है यही वजह है कि अमेरिका भी भारत के साथ रिश्तों को व्यवहारिक नजरिये से देख रहा है।

विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया

विपक्षी दलों ने सरकार से सवाल किया है कि—क्या व्यापार समझौते में कृषि, एमएसएमई और डेटा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भारत के हित सुरक्षित रहेंगे?

हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अमेरिका के साथ मजबूत आर्थिक रिश्ते भारत के लिए जरूरी हैं।

निष्कर्ष

रूसी तेल को लेकर उठे सवालों के बावजूद भारत-अमेरिका संबंध किसी मोड़ पर नहीं, बल्कि नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं। व्यापार समझौता केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि—

रणनीतिक विश्वास भू-राजनीतिक संतुलनऔर वैश्विक शक्ति समीकरण का प्रतिबिंब बनेगा।अब असली सवाल यह नहीं कि डील कब होगी, बल्कि यह है कि भारत उसे अपने हितों के मुताबिक कितनी मजबूती से गढ़ पाता है।

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