बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 4 फरवरी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच घोषित द्विपक्षीय व्यापार समझौते ने एक तरफ़ जहां भारत-अमेरिका आर्थिक रिश्तों को नई ऊंचाई पर पहुंचाने का दावा किया है, वहीं दूसरी ओर देश की राजनीति और किसान आंदोलन में एक नई बहस छेड़ दी है।
सवाल सीधा है—क्या यह सौदा भारत के निर्यातकों की जीत है या किसानों के हितों पर समझौता?
सरकार जहां इसे “गेम-चेंजर ट्रेड डील” बता रही है, वहीं संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) और विपक्ष इसे “अमेरिकी दबाव में किया गया आत्मसमर्पण” करार दे रहे हैं।किसान क्यों भड़के: भरोसे का सवालभारत-अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा के महज एक दिन बाद ही संयुक्त किसान मोर्चा का तीखा बयान सामने आया। एसकेएम ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ने “डोनाल्ड ट्रंप के फरमानों के आगे बेशर्मी से सिर झुका दिया” और किसानों के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात किया।
किसान नेताओं का तर्क भावनात्मक भी है और राजनीतिक भी।“प्रधानमंत्री ने लाल किले से कहा था कि किसानों के हितों के लिए वह खुद कीमत चुकाने को तैयार हैं। अब वही सरकार अमेरिकी साम्राज्यवाद के दबाव में भारतीय बाजार खोल रही है।”— संयुक्त किसान मोर्चा एसकेएमसीएच को आशंका है कि शून्य या बेहद कम टैरिफ की व्यवस्था से अमेरिका के अत्यधिक सब्सिडी प्राप्त कृषि उत्पाद—खासतौर पर मक्का, सोयाबीन और डेयरी—भारतीय बाजार में बाढ़ की तरह आएंगे, जिससे पहले से संकटग्रस्त किसान तबका पूरी तरह टूट जाएगा।
सरकार का जवाब: “कृषि और डेयरी रेड लाइन हैं
”सरकार इन आरोपों को सिरे से खारिज कर रही है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि—कृषि और डेयरी भारत के ‘नॉन-नेगोशिएबल सेक्टर’ हैंअनाज, मक्का, सोयाबीन और GM फूड को समझौते से बाहर रखा गया है किसानों और पशुपालकों के हितों से कोई समझौता नहीं हुआ
सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह डील कृषि आयात खोलने की नहीं, बल्कि भारतीय उद्योग और MSMEs को अमेरिकी बाजार में राहत देने की रणनीति है।
राजनीतिक विश्लेषण: अर्थशास्त्र बनाम चुनावी गणित
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद सिर्फ व्यापार का नहीं, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव का है।एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं—“मोदी सरकार वैश्विक मंच पर भारत को सप्लाई-चेन हब बनाना चाहती है, लेकिन घरेलू राजनीति में किसान अब भी सबसे संवेदनशील वर्ग हैं। यही टकराव दिखाई दे रहा है।
”विपक्ष ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है।
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार 2020-21 के किसान आंदोलन से कोई सबक नहीं सीख पाईवाम दलों ने इसे नव-उदारवादी नीतियों का विस्तार बताया कुछ क्षेत्रीय दलों ने आशंका जताई कि इसका असर राज्यों की कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा
कानूनविदों की राय: डर या दस्तावेज़?
अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानून के विशेषज्ञ इस बहस को थोड़ा संतुलित नज़रिये से देखते हैं।उनके अनुसार—सभी टैरिफ रियायतें तुरंत लागू नहीं होंगी, बल्कि चरणबद्ध होंगी कई वस्तुओं पर आयात कोटा लागू रहेगा भारत के पास सेफगार्ड और एंटी-डंपिंग प्रावधान मौजूद हैं-एक कानूनविद के शब्दों में—“जब तक समझौते का पूरा टेक्स्ट सामने नहीं आता, तब तक ‘शून्य टैरिफ’ का दावा राजनीतिक बयानबाज़ी ज्यादा है, कानूनी सच्चाई कम।”
आयात-निर्यात का गणित: ट्रंप का दावा बनाम हकीकत
राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि भारत अमेरिका से $500 बिलियन से अधिक का आयात करेगा—ऊर्जा, कृषि और तकनीक समेत।लेकिन अर्थशास्त्री इस दावे को अतिरंजित मानते हैं।2024-25 में भारत का कुल वस्तु आयात: $721 बिलियनअमेरिका से आयात: $46 बिलियनअगले 5 वर्षों में अनुमानित आयात: $100 बिलियन प्रतिवर्ष (औसतन)भारत जिन क्षेत्रों में आयात बढ़ा सकता है, वे हैं—कच्चा तेल और LNGहाई-वैल्यू सेमीकंडक्टर चिप्सडेटा सेंटर और AI उपकरण विमान, इंजन और परमाणु उपकरण यानी खेती से ज्यादा ऊर्जा और तकनीक इस डील का केंद्र हैं।किसे फायदा, किसे डर?सरकार का दावा है कि इस समझौते से—कपड़ा, चमड़ा, समुद्री उत्पादरत्न-आभूषण और MSMEsको अमेरिकी बाजार में बड़ी राहत मिलेगी, क्योंकि अमेरिकी टैरिफ 50% से घटकर 18% हो जाएगा।
किसान संगठनों का डर यह है कि—आज कृषि बाहर है कल दबाव बढ़ा तो दरवाज़ा खुल सकता है
निष्कर्ष:
सौदा या संघर्ष?
भारत-अमेरिका ट्रेड डील आर्थिक रूप से भारत के निर्यातकों के लिए राहत लेकर आती दिख रही है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह सरकार के लिए एक नई अग्निपरीक्षा बन गई है।एक तरफ़ वैश्विक बाज़ार में भारत की स्वीकार्यता, दूसरी तरफ़ घरेलू किसान का भरोसा—
यही इस पूरी बहस का असली केंद्र है।अब निगाहें संयुक्त बयान और अंतिम दस्तावेज़ पर टिकी हैं। क्योंकि अंततः सवाल यह नहीं है कि ट्रंप ने क्या कहा, बल्कि यह है कि कागज़ पर भारत ने क्या लिखा।
