आधी रात की गिरफ्तारी, ‘जान का खतरा’ और सत्ता से टकराव पप्पू यादव बनाम व्यवस्था: कानून का पालन या राजनीतिक प्रतिशोध?

बी के झा

NSK

पटना/पूर्णिया, 7 फरवरी

बिहार की राजनीति में शुक्रवार आधी रात एक बार फिर उबाल पर दिखी, जब पूर्णिया के निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को पुलिस ने उनके पटना स्थित आवास से 31 साल पुराने एक मामले में गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी से पहले करीब तीन घंटे तक हाई-वोल्टेज ड्रामा चला—समर्थक सड़कों पर, पुलिस मोर्चे पर और खुद सांसद ‘जान के खतरे’ की आशंका जता रहे थे।गिरफ्तारी के बाद पप्पू यादव ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई करार देते हुए कहा कि उन्हें नीट छात्रा से दरिंदगी के खिलाफ प्रस्तावित आंदोलन से रोकने की साजिश रची गई है।“

मुझे मार सकते हैं”—सांसद का सनसनीखेज आरोपपुलिस की गाड़ी में बैठाए जाने से पहले पप्पू यादव ने मीडिया से कहा,“मैं कोर्ट के आदेश का सम्मान करता हूं। कल मुझे कोर्ट में पेश होना था, इसलिए संसद सत्र छोड़कर दिल्ली से आया। लेकिन ये लोग जबरन ले जाना चाहते हैं। मेरी जान को खतरा है। मुझे शक है कि ये मुझे मार सकते हैं।”उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस सिविल ड्रेस में उनके आवास पहुंची, जिससे उन्हें संदेह हुआ कि यह गिरफ्तारी नहीं बल्कि डराने की कार्रवाई है।

पुलिस का पक्ष: “कोर्ट का वारंट था”

पटना सिटी एसपी भानु प्रताप सिंह ने कहा कि यह मामला वर्ष 1995 का है, जो गर्दनीबाग थाना कांड संख्या 552/95 से जुड़ा है। अदालत में मामला लंबित था और सांसद के पेश न होने के कारण गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया था।उन्होंने बताया कि:सांसद को जरूरी दवाइयां उपलब्ध कराई गईं उनके केयरटेकर को साथ भेजा गया मेडिकल जांच के बाद उन्हें न्यायालय में पेश किया जाएगा पुलिस के मुताबिक, मामला धोखाधड़ी, जालसाजी, धमकी और आपराधिक साजिश से जुड़ा है, जिसमें IPC की धारा 419, 420, 468, 448, 506 और 120B (अब BNS के तहत) लगी हैं।

कानूनविदों की राय: रात में गिरफ्तारी, लेकिन सवाल बरकरार

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि गिरफ्तारी तकनीकी रूप से वैध हो सकती है, लेकिन इसकी टाइमिंग और तरीका कई सवाल खड़े करता है।पटना हाईकोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता कहते हैं,“अगर सांसद ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह अगले दिन कोर्ट में पेश होंगे, तो आधी रात गिरफ्तारी की जल्दबाज़ी टालने योग्य थी। कानून में विवेक भी एक तत्व है।

”राजनीतिक विश्लेषक: ‘लॉ एंड ऑर्डर’ बनाम ‘पॉलिटिकल मैसेजिंग’

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह घटना सिर्फ एक कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक का कहना है,“पप्पू यादव एक ऐसे नेता हैं जो सत्ता से टकराव में रहते हैं—चाहे प्रवासी मजदूर हों, छात्र हों या अपराध के खिलाफ आवाज़। उनकी गिरफ्तारी यह संकेत देती है कि असहज सवाल पूछने वालों के लिए व्यवस्था सख्त हो सकती है।”

विपक्ष का हमला: “यह लोकतंत्र नहीं, डर की राजनीति है”

राजद, कांग्रेस और वाम दलों ने इस गिरफ्तारी को तानाशाही मानसिकता का उदाहरण बताया।राजद प्रवक्ता ने कहा,“अगर 31 साल पुराना केस इतना ही जरूरी था, तो ठीक उसी रात क्यों, जब पप्पू यादव छात्र आंदोलन की घोषणा कर चुके थे?”

कांग्रेस नेताओं ने इसे संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग का मामला बताया।

छात्र संगठनों में उबाल नीट छात्रा से दरिंदगी के खिलाफ पप्पू यादव के समर्थन में खड़े कई छात्र संगठनों ने गिरफ्तारी का विरोध किया है।AISA, NSUI और अन्य छात्र संगठनों ने संयुक्त बयान में कहा,“एक जनप्रतिनिधि जो छात्रों के पक्ष में सड़क पर उतरने वाला था, उसे आधी रात गिरफ्तार करना बताता है कि सरकार सवालों से डरती है।”पटना विश्वविद्यालय और पूर्णिया कॉलेज परिसरों में विरोध प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है।

समर्थक सड़क पर, पुलिस अलर्टगिरफ्तारी के दौरान और बाद में पप्पू यादव के आवास पर सैकड़ों समर्थक जुटे रहे। समर्थकों ने पुलिस को रोकने की कोशिश की, जिसके बाद पटना और पूर्णिया में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। आज कोर्ट पेशी के दौरान प्रदर्शन की आशंका को देखते हुए सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

निष्कर्ष:

कानून की किताब बनाम लोकतंत्र की आत्मा

पप्पू यादव की गिरफ्तारी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है, लेकिन जिस तरह से इसे अंजाम दिया गया, उसने लोकतंत्र, असहमति और सत्ता के धैर्य पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

क्या यह सिर्फ अदालत के आदेश का पालन था?

या फिर यह एक ऐसे नेता को संदेश है, जो बार-बार व्यवस्था की नींद में खलल डालता है?

इस सवाल का जवाब अब सिर्फ अदालत नहीं, बिहार की सियासत भी देगी।

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