संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता और चीन का बदला रुख: क्या यह रणनीतिक संकेत है या कूटनीतिक संतुलन?

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 11 फरवरी

नई दिल्ली में 10 फरवरी 2026 को हुई भारत–चीन उच्चस्तरीय बैठक ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। चीन द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सदस्यता को लेकर भारत की “आकांक्षाओं को समझने और उनका सम्मान करने” का बयान, अपने आप में असामान्य और महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि चीन ने क्या कहा, बल्कि यह है कि क्यों कहा और आगे इसका अर्थ क्या निकाला जाए।

कूटनीति में बदले सुर: संकेत या रणनीति?

विदेश सचिव विक्रम मिसरी और चीन के कार्यकारी उप विदेश मंत्री मा झाओक्सू की इस बैठक को केवल औपचारिक संवाद मानना एक बड़ी भूल होगी। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकार प्रो. (डॉ.) अरुण सहगल के अनुसार,“चीन का यह बयान समर्थन नहीं बल्कि strategic ambiguity है। ड्रैगन न तो पूरी तरह हां कह रहा है, न ही इनकार—यह उसकी परिचित कूटनीतिक शैली है।”वास्तव में, चीन अब तक UNSC विस्तार के प्रश्न पर पाकिस्तान की आपत्तियों को मौन समर्थन देता रहा है। ऐसे में भारत के प्रति सकारात्मक भाषा, बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों की ओर इशारा करती है।

सीमा शांति और वैश्विक मंच:

आपसी निर्भरता की राजनीति बैठक में सीमा पर शांति बनाए रखने और द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर रखने पर जो जोर दिया गया, वह केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं बल्कि वैश्विक मंचों पर सहयोग की शर्त भी है। अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञ और पूर्व राजनयिक राजीव धवन कहते हैं,“UNSC सुधार कोई एक देश का फैसला नहीं है। लेकिन चीन यदि भारत को स्वीकार्य मानने लगता है, तो यह वैश्विक दक्षिण (Global South) की राजनीति में बड़ा बदलाव होगा।”कैलाश मानसरोवर यात्रा, वीजा सुविधा, एअर सर्विस एग्रीमेंट और लोगों के बीच संपर्क—ये सभी ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ के संकेत हैं, जिनके जरिए विश्वास बहाली की कोशिश दिखती है।

विपक्ष का सवाल: बयान से आगे क्या?

हालांकि, भारत के विपक्षी दल इस घटनाक्रम को लेकर सतर्क हैं। कांग्रेस प्रवक्ता का कहना है,“चीन के शब्दों से ज्यादा ज़रूरी है उसके कर्म। क्या वह UNSC में भारत के नाम का समर्थन करेगा या फिर यह सिर्फ एक शिष्टाचार है?”

वामपंथी दलों ने भी आगाह किया कि गलवान के बाद बने हालात अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं और सरकार को “अत्यधिक उत्साह” से बचना चाहिए।

ब्रिक्स, वैश्विक बदलाव और भारत की भूमिका

चीन के उप विदेश मंत्री का ब्रिक्स शेरपा बैठक में भाग लेना भी संयोग नहीं है। यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी देशों का दबाव, और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता—इन सबके बीच चीन और भारत दोनों ही बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) की बात कर रहे हैं।राजनीतिक विश्लेषक मीरा रॉय के शब्दों में,“भारत आज केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णयों में भागीदार है। चीन इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

निष्कर्ष:

अवसर भी, चेतावनी भी

भारत–चीन संबंधों में यह नरमी निश्चित रूप से एक अवसर है—लेकिन साथ ही एक चेतावनी भी। UNSC की स्थायी सदस्यता पर चीन का रुख यदि भविष्य में ठोस समर्थन में बदलता है, तो यह भारत की कूटनीतिक जीत होगी। परंतु इतिहास गवाह है कि चीन के साथ रिश्तों में आशावाद और सावधानी दोनों साथ-साथ चलने चाहिए।

फिलहाल इतना तय है कि भारत की वैश्विक हैसियत को लेकर अब खुले तौर पर संदेह जताना आसान नहीं रहा।

ड्रैगन के बदले सुर इस बात का संकेत हैं कि दुनिया की ताकतों का संतुलन धीरे-धीरे बदल रहा है—

और भारत उस बदलाव के केंद्र में खड़ा है।

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