बी के झा
NSK

नई दिल्ली/ पटना, 12 फरवरी
बिहार में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘वन नेशन, वन स्टूडेंट आईडी’ के तहत अपार (APAAR) कार्ड बनाने की प्रक्रिया ने तेज रफ्तार जरूर पकड़ी है, लेकिन यह रफ्तार अब एक बड़ी प्रशासनिक और सामाजिक बाधा से टकरा गई है—आधार कार्ड की कमी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के सरकारी स्कूलों में नामांकित 1.65 करोड़ बच्चों में से करीब 74 प्रतिशत (1,22,69,756 छात्र) का अपार कार्ड 11 फरवरी 2026 तक बन चुका है। इसके बावजूद लगभग 30 लाख बच्चे ऐसे हैं, जिनका आधार कार्ड नहीं होने के कारण वे इस डिजिटल शैक्षणिक पहचान से वंचित हैं।
क्या है अपार आईडी और क्यों अहम?
अपार आईडी एक 12 अंकों की विशिष्ट छात्र पहचान संख्या है, जिसे छात्र के पूरे शैक्षणिक जीवन का डिजिटल आधार माना जा रहा है। सरकार का दावा है कि यह आईडी भविष्य में छात्रों के लिए मार्कशीट, डिग्री, माइग्रेशन सर्टिफिकेट, स्कॉलरशिप और अन्य शैक्षणिक लाभों को एक क्लिक पर उपलब्ध कराएगी।हालांकि तकनीकी रूप से इसे अभी पूरी तरह अनिवार्य घोषित नहीं किया गया है, लेकिन स्कूलों और शिक्षा विभाग के स्तर पर इसे व्यवहारिक रूप से अनिवार्य बनाया जा रहा है।
आंकड़ों की तस्वीर: प्राथमिक शिक्षा सबसे पीछे
आंकड़े बताते हैं कि अपार कार्ड निर्माण में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है।छठी से बारहवीं तक:67.48 लाख छात्रों का अपार कार्ड बन चुका है (कुल बने कार्ड का 55%)पहली से पांचवीं तक:केवल 55.21 लाख बच्चों का ही कार्ड बन पाया
शिक्षाविदों का मानना है कि प्राथमिक स्तर पर माता-पिता की जागरूकता की कमी, दस्तावेजों का अभाव और प्रशासनिक संसाधनों की कमी इसकी बड़ी वजह है।आधार की कमी: सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी सरकारी स्कूलों में 29,98,278 बच्चे ऐसे हैं जिनका आधार कार्ड अब तक नहीं बन पाया है। इनमें बड़ी संख्या उन बच्चों की है, जिनका पहली कक्षा में नामांकन प्रोविजनल तौर पर किया गया था।ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में आधार केंद्रों की भारी कमी के कारण प्रधानाध्यापकों पर अतिरिक्त बोझ आ गया है। उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ आधार बनवाने की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ रही है।
शिक्षाविदों की राय: “डिजिटल सुधार, लेकिन जमीनी तैयारी अधूरी”
वरिष्ठ शिक्षाविद और शिक्षा नीति विशेषज्ञों का कहना है कि अपार आईडी जैसी योजनाएं शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और पोर्टेबल बनाती हैं, लेकिन बिना आधारभूत ढांचे के इन्हें लागू करना डिजिटल असमानता को और गहरा कर सकता है।उनका सुझाव है कि सरकार को पहले आधार नामांकन शिविर, मोबाइल आधार वैन और स्कूल-स्तरीय सहायता सुनिश्चित करनी चाहिए।
कानूनविदों का सवाल: क्या परोक्ष रूप से अनिवार्यता सही?
कानूनी विशेषज्ञ इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि जब अपार आईडी को आधिकारिक रूप से अनिवार्य नहीं बताया गया है, तो स्कूलों द्वारा इसे व्यावहारिक रूप से अनिवार्य बनाना क्या सही है?उनका तर्क है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत किसी भी बच्चे को दस्तावेजों के अभाव में शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। यदि आधार न होने के कारण भविष्य में किसी छात्र का शैक्षणिक लाभ रुकता है, तो यह संवैधानिक बहस का विषय बन सकता है।
विपक्ष का हमला: “डिजिटल इंडिया या डिजिटल बहिष्कार?
”विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। उनका आरोप है कि केंद्र और राज्य सरकारें डिजिटल इंडिया के नाम पर गरीब और वंचित बच्चों को सिस्टम से बाहर कर रही हैं।विपक्षी नेताओं का कहना है कि जब तक हर बच्चे का आधार नहीं बन जाता, तब तक अपार आईडी को किसी भी तरह से अनिवार्य करना असंवेदनशील और अव्यवहारिक है।
सरकार का पक्ष: “प्रक्रिया जारी, किसी को वंचित नहीं किया जाएगा
”शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अपार आईडी भविष्य की जरूरत है और इसका उद्देश्य बच्चों को लाभ पहुंचाना है, न कि उन्हें बाहर करना। सरकार का दावा है कि जल्द ही विशेष अभियान चलाकर आधार विहीन बच्चों का नामांकन पूरा किया जाएगा।
निष्कर्ष:
नीति अच्छी, क्रियान्वयन में संतुलन जरूरी
अपार आईडी निश्चित रूप से भारत की शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल और एकीकृत बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। लेकिन बिहार का अनुभव यह भी दिखाता है कि तकनीकी सुधार तभी सफल होंगे, जब सामाजिक और प्रशासनिक हकीकतों को साथ लेकर चला जाए।
अगर आधार की बाधा समय रहते नहीं हटाई गई, तो ‘वन नेशन, वन स्टूडेंट आईडी’ का सपना कहीं ‘वन सिस्टम, मल्टीपल एक्सक्लूजन’ में न बदल जाए।
