संगीत, सृजन और संविधान की कसौटी सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला, ए.आर. रहमान मामला और कॉपीराइट बहस का नया अध्याय

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 16 फरवरी

भारतीय सिनेमा और शास्त्रीय संगीत की दुनिया से जुड़े एक ऐतिहासिक कॉपीराइट विवाद में अब सर्वोच्च न्यायिक मोहर लग गई है। Supreme Court of India ने 13 फ़रवरी को फ़िल्म Ponniyin Selvan II** के चर्चित गीत ‘वीरा राजा वीरा’ को लेकर दिए गए Delhi High Court के सिंगल जज के फ़ैसले को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस गीत का संगीत ठाकर बंधुओं द्वारा रचित ‘शिव स्तुति’ से प्रेरित और उसी पर आधारित है।यह फ़ैसला न केवल प्रसिद्ध संगीतकार A. R. Rahman के करियर में एक अहम कानूनी मोड़ है, बल्कि भारतीय बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) के इतिहास में भी मील का पत्थर माना जा रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि:

अदालत तक कैसे पहुंची धुन

भारतीय शास्त्रीय गायक फ़ैयाज़ वसीफ़ुद्दीन ठाकर ने 2023 में दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि ‘वीरा राजा वीरा’ का संगीत उनके पिता उस्ताद नासिर फ़ैयाज़ुद्दीन ठाकर और ज़हीरुद्दीन ठाकर द्वारा रचित ‘शिव स्तुति’ से कॉपी किया गया है।याचिकाकर्ता का दावा था कि पारिवारिक समझौते के तहत उन्हें इस रचना का वैध कॉपीराइट प्राप्त है, लेकिन फ़िल्म निर्माण से जुड़े पक्षों—मद्रास टॉकीज़, लाइका प्रोडक्शन और ए.आर. रहमान—ने उन्हें न तो श्रेय दिया और न ही अनुमति ली।

दिल्ली हाई कोर्ट के सिंगल जज ने 25 अप्रैल 2024 को रहमान के विरुद्ध फ़ैसला देते हुए:ओटीटी और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर क्रेडिट स्लाइड बदलने‘शिव स्तुति’ पर आधारित होने की स्पष्ट सूचना देनेऔर 2 करोड़ रुपये अदालत में जमा कराने का आदेश दिया था।हालांकि बाद में डिवीज़न बेंच ने यह फ़ैसला पलट दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अब सिंगल जज के आदेश को पुनः बहाल कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “यह सम्मान और पहचान का प्रश्न है”

मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant और न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा:“यह केवल राग का सवाल नहीं है। यह रचनात्मक कंपोज़िशन, श्रेय और सम्मान का मामला है।”अदालत ने यह भी माना कि ए.आर. रहमान स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि गीत ठाकरवाणी संगीत परंपरा से जुड़ा है। ऐसे में मूल रचनाकारों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

ए.आर. रहमान का पक्ष: परंपरा बनाम स्वामित्व

ए.आर. रहमान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Abhishek Manu Singhvi ने दलील दी कि ‘शिव स्तुति’ ध्रुपद शैली की पारंपरिक रचना है और पब्लिक डोमेन का हिस्सा है।उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग वर्षों में कई कलाकारों ने इसी संगीत पर आधारित प्रस्तुतियां दीं, जिन पर कभी आपत्ति नहीं की गई।

कानूनविदों की राय: यह राग नहीं, रचना का अधिकार है

बौद्धिक संपदा कानून के विशेषज्ञों का कहना है कि यह फ़ैसला भारतीय संगीत उद्योग के लिए “वेक-अप कॉल” है।एक वरिष्ठ कानूनविद के अनुसार:“अदालत ने साफ़ कर दिया है कि राग पर नहीं, लेकिन रचना की विशिष्ट संरचना पर अधिकार हो सकता है। यह कलाकारों के अधिकारों की जीत है।”

शिक्षाविद और सांस्कृतिक विश्लेषण

संगीत और संस्कृति के अध्येताओं का मानना है कि भारतीय शास्त्रीय परंपरा में गुरु-शिष्य परंपरा रही है, लेकिन आधुनिक युग में श्रेय और अधिकार को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।एक शिक्षाविद ने कहा,“यह फ़ैसला परंपरा और आधुनिक क़ानून के बीच संतुलन स्थापित करता है।”

राजनीतिक विश्लेषक: रचनात्मक स्वतंत्रता बनाम अधिकार संरक्षण

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह मामला केवल कला तक सीमित नहीं, बल्कि क्रिएटिव इंडस्ट्री में श्रम अधिकार से भी जुड़ा है।उनका मानना है कि सरकार को डिजिटल युग में कॉपीराइट क़ानूनों को और स्पष्ट व सख़्त बनाना होगा।विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाविपक्षी नेताओं ने अदालत के फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह “कलाकारों के अधिकारों की रक्षा” की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

एक विपक्षी प्रवक्ता ने कहा,“

बड़े नामों के सामने छोटे कलाकारों की आवाज़ दबनी नहीं चाहिए।”

मुस्लिम मौलानाओं और सांस्कृतिक संगठनों की प्रतिक्रिया

कुछ मुस्लिम मौलानाओं और सांस्कृतिक प्रतिनिधियों ने इसे नैतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बताया।एक मौलाना ने कहा,“इस्लाम भी अमानत और हक़ की बात करता है। किसी की रचना का श्रेय देना नैतिक और धार्मिक—दोनों दृष्टियों से आवश्यक है।

”इलैयाराजा संदर्भ:

बढ़ती कानूनी चेतना यह मामला उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें दिग्गज संगीतकार Ilaiyaraaja भी अपने गीतों के अनधिकृत उपयोग के विरुद्ध अदालत का दरवाज़ा खटखटा चुके हैं।विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे संगीतकारों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी है।

निष्कर्ष:

एक फ़ैसला, दूरगामी प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय केवल ए.आर. रहमान या ‘वीरा राजा वीरा’ तक सीमित नहीं है। यह भारतीय रचनात्मक उद्योग को स्पष्ट संदेश देता है—

परंपरा प्रेरणा हो सकती है, लेकिन श्रेय और अधिकार अनिवार्य हैं।आने वाले वर्षों में यह फ़ैसला संगीत, फ़िल्म और डिजिटल कंटेंट के क्षेत्र में कॉपीराइट की दिशा और दशा तय करने वाला साबित हो सकता है।

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