सरकार बनते ही 100 सबसे भ्रष्ट नेताओं और अफसरों पर गिरेगी गाज” — प्रशांत किशोर का बड़ा ऐलान, पहले महीने में बनेगा कानून, जब्त होगी भ्रष्टाचार से कमाई गई संपत्ति; विरोधियों ने साधा निशाना

बी के झा

NSK

पटना / नई दिल्ली, 15 अक्टूबर

बिहार की राजनीति में इस वक्त सबसे ज्यादा सुर्खियों में हैं — प्रशांत किशोर (पीके)।जन सुराज पार्टी के संस्थापक ने बुधवार को भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा ऐलान किया है, जिसने सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक सबको चौंका दिया है।

किशोर ने कहा कि अगर उनकी पार्टी बिहार की सत्ता में आती है, तो सरकार बनते ही पहले महीने के भीतर 100 सबसे भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने स्पष्ट कहा —राज्य के 100 सबसे भ्रष्ट नेताओं और ब्यूरोक्रैट्स की पहचान करने के लिए एक विशेष कानून बनाया जाएगा। उनकी अवैध संपत्ति जब्त कर उसे राज्य के विकास कार्यों में लगाया जाएगा।

”भ्रष्टाचार को बताया बिहार की सबसे बड़ी बीमारी प्रशांत किशोर ने अपने इंटरव्यू में कहा कि बिहार में भ्रष्टाचार “कैंसर की तरह फैल चुका है।”उन्होंने आरोप लगाया कि चाहे राजग (NDA) की सरकार हो या राजद (RJD) की, दोनों ही गठबंधनों ने बिहार को भ्रष्टाचार के दलदल में धकेला है।

किशोर ने कहा —NDA सरकार में भ्रष्टाचार व्याप्त है। फर्क बस इतना है कि भाजपा-जदयू की छवि राजद की तरह बदनाम नहीं हुई है, लेकिन भीतर से हालात उतने ही बुरे हैं।“छह वादे, जो बिहार को माफिया मुक्त बनाएंगे”

पीके ने बताया कि जन सुराज पार्टी ने बिहार के लिए छह बड़े वादे किए हैं, जिनमें प्रमुख है —भू-माफिया,रेत खनन माफिया,शराब माफिया और अन्य अवैध नेटवर्क का सफाया।उन्होंने कहा कि उनकी सरकार बनते ही “फर्जी शराबबंदी नीति” को खत्म किया जाएगा और उसके स्थान पर एक व्यवहारिक व पारदर्शी नीति लाई जाएगी।

किशोर ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा शायद बिहार के कुछ भ्रष्ट नेता और अफसर आजकल पूजा-पाठ कर रहे होंगे कि हम सत्ता में न आएं।”

“अवैध कमाई जब्त कर सरकार के खजाने में जाएगी”पीके ने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्ट नेताओं और अफसरों पर मुकदमा चलाया जाएगा।हम उनकी अवैध कमाई जब्त करके सरकारी खजाने में जमा करेंगे, ताकि उसी पैसे से बिहार का विकास हो सके — जो इनकी गलत नीतियों के कारण वर्षों से रुका हुआ है,

”उन्होंने कहा।NDA पर सीधा हमला — “उपमुख्यमंत्री खुद हत्या मामले के आरोपी”प्रशांत किशोर ने बिना नाम लिए NDA के शीर्ष नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए।उन्होंने कहा कि उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सात लोगों की हत्या से संबंधित मामले में आरोपी हैं, फिर भी सत्ता में बने हुए हैं।

पीके ने कहा —वे न तो बरी हुए हैं और न ही जमानत पर हैं। एक फर्जी प्रमाणपत्र दिखाकर उन्होंने खुद को नाबालिग बताया और मुकदमे से बच निकले। यही बिहार की सच्चाई है।”उन्होंने आगे कहा कि भाजपा और जदयू के कई मंत्रियों पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, जिन पर कार्रवाई करने की हिम्मत किसी में नहीं है।

विपक्ष ने साधा निशाना — “पहले बताओ कितनी सीटें जीतोगे?

”प्रशांत किशोर के इस बयान पर राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई।NDA और इंडिया गठबंधन, दोनों खेमों ने पीके पर पलटवार किया।

राजद नेताओं ने तंज कसा —प्रशांत किशोर पहले यह तो बताएं कि वे किसके लिए सरकार बनाने निकले हैं और कितनी सीटें जीतने वाले हैं। बड़ी-बड़ी बातें करने से बिहार नहीं बदलेगा।

”वहीं NDA खेमे से भाजपा प्रवक्ता अजय आलोक ने तीखा हमला बोला प्रशांत किशोर बिहार के दूसरे केजरीवाल हैं, जो सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप से पहचान बनाना चाहते हैं। अगर वे इतने ईमानदार होते तो चंद पैसों के लिए तेजस्वी यादव से राघोपुर सीट का सौदा नहीं करते।कार्यकर्ताओं में असंतोष, टिकट वितरण पर उठे सवाल सूत्रों के अनुसार, हाल ही में जन सुराज पार्टी के अंदर टिकट बंटवारे को लेकर असंतोष देखने को मिला था। कुछ कार्यकर्ताओं ने प्रशांत किशोर पर आरोप लगाया कि उन्होंने टिकट वितरण में मोटी रकम ली, जिसके विरोध में आगजनी और तोड़फोड़ तक की घटनाएँ हुईं।हालाँकि पार्टी ने इन आरोपों को सिरे से नकार दिया है।

विश्लेषण: भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडा — वादा या राजनीति का हथियार?राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रशांत किशोर ने इस बयान के ज़रिए बिहार की राजनीति में “ईमानदारी बनाम भ्रष्टाचार” की नई बहस छेड़ दी है।लेकिन यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या उनकी पार्टी को इतना जनसमर्थन मिलेगा कि वे सत्ता तक पहुँच सकें?

राजनीति के जानकार मानते हैं कि —पीके के पास नीति है, नीयत है, लेकिन संगठन और ज़मीनी वोट बैंक की कमी अभी भी सबसे बड़ी चुनौती है।”

निष्कर्ष

प्रशांत किशोर का यह ऐलान निस्संदेह बिहार की सियासत में नई हलचल पैदा कर चुका है।भ्रष्टाचार पर सीधे वार और बड़े नेताओं पर नाम लेकर आरोप लगाने की उनकी रणनीति ने उन्हें चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

अब देखना यह होगा कि जनता उनके इस एजेंडे को कितना स्वीकार करती है और क्या वे वाकई ‘ईमानदार राजनीति’ का नया अध्याय लिख पाते हैं या यह भी महज़ एक चुनावी नारा बनकर रह जाएगा।

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