बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 4 अप्रैल
दक्षिण एशिया की जटिल कूटनीतिक बिसात पर चीन एक बार फिर “शांतिदूत” की भूमिका में उतरता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए बीजिंग में शुरू हुई त्रिपक्षीय वार्ता को पहली नजर में क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में सकारात्मक पहल माना जा सकता है। लेकिन यदि इस पहल की परतों को गहराई से खंगाला जाए, तो इसके पीछे छिपे रणनीतिक संकेत कहीं अधिक व्यापक और चिंताजनक नजर आते हैं।चीन की यह सक्रियता ऐसे समय में सामने आई है, जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच संबंध अपने सबसे नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। सीमा विवाद, आतंकी गतिविधियों के आरोप और राजनीतिक अविश्वास ने दोनों देशों के रिश्तों को गहरे संकट में डाल दिया है। ऐसे में चीन का मध्यस्थ बनकर सामने आना महज संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित कूटनीतिक कदम प्रतीत होता है।
शांति या स्वार्थ?
चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से यह दावा किया गया है कि दोनों देशों के बीच संवाद की प्रक्रिया फिर से शुरू होना “सकारात्मक संकेत” है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकार इसे केवल शांति स्थापना का प्रयास नहीं मानते। उनका स्पष्ट मत है कि चीन का प्राथमिक उद्देश्य अपने रणनीतिक और सुरक्षा हितों की रक्षा करना है।अफगानिस्तान में चीनी निवेश और वहां कार्यरत नागरिकों की सुरक्षा बीजिंग के लिए एक बड़ी चिंता है। इसके अलावा, वाखान कॉरिडोर—जो अफगानिस्तान को चीन के शिनजियांग प्रांत से जोड़ता है—भी चीन की सुरक्षा दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। चीन को आशंका है कि इस मार्ग से उग्रवादी तत्व उसके भीतर प्रवेश कर सकते हैं, विशेषकर ईस्ट तुर्केस्तान इस्लामिक मूवमेंट जैसी गतिविधियों के संदर्भ में।
भारत को घेरने की कूटनीति
इस पूरी पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है—भारत को रणनीतिक रूप से सीमित करने की कोशिश। पिछले कुछ समय में भारत और तालिबान के बीच बढ़ते संपर्कों ने क्षेत्रीय समीकरणों को नया रूप दिया है। मानवीय सहायता, बुनियादी ढांचे में सहयोग और कूटनीतिक संवाद के माध्यम से भारत ने अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति को पुनर्स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।यही वह बिंदु है, जहां चीन की चिंता स्पष्ट रूप से सामने आती है। बीजिंग चाहता है कि काबुल पर उसका प्रभाव बना रहे और इसके लिए वह इस्लामाबाद के माध्यम से अपने हितों को साधने की रणनीति पर काम कर रहा है। यदि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्ते सामान्य होते हैं, तो चीन के लिए यह दोहरा लाभ होगा—एक ओर क्षेत्र में स्थिरता का श्रेय, और दूसरी ओर भारत के प्रभाव को सीमित करने का अवसर।
बेल्ट एंड रोड की वापसी की कोशिश
चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) परियोजना भी इस कूटनीति के केंद्र में है। अफगानिस्तान में अस्थिरता के कारण यह परियोजना लंबे समय से ठहरी हुई है। यदि क्षेत्र में शांति स्थापित होती है, तो चीन न केवल अपनी आर्थिक परियोजनाओं को पुनर्जीवित कर सकेगा, बल्कि मध्य एशिया तक अपनी पहुंच को और मजबूत कर पाएगा।
वैश्विक संकट और चीन की चाल
यह पूरी कूटनीतिक सक्रियता ऐसे समय में हो रही है, जब वैश्विक स्तर पर तनाव चरम पर है—विशेषकर ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव और होर्मुज जलडमरूमध्य के संकट ने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चुनौतियां पैदा कर दी हैं।जहां भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने के लिए बहुपक्षीय कूटनीति का सहारा ले रहा है, वहीं चीन इस अस्थिरता को अवसर में बदलने की कोशिश कर रहा है। वह स्वयं को एक “स्थिरता प्रदाता” (Stability Provider) के रूप में स्थापित करना चाहता है, ताकि वैश्विक मंच पर उसकी छवि और प्रभाव दोनों मजबूत हों।
निष्कर्ष:
कूटनीति की नई परिभाषा
चीन की यह पहल एक बार फिर यह साबित करती है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में “शांति” भी एक रणनीतिक उपकरण बन चुकी है। जो देश शांति की पहल करता हुआ दिखता है, वही अपने दीर्घकालिक हितों को सबसे चतुराई से साध रहा होता है।दक्षिण एशिया के लिए यह समय सतर्क रहने का है। भारत को न केवल अपनी कूटनीतिक सक्रियता बनाए रखनी होगी, बल्कि क्षेत्रीय साझेदारियों को भी मजबूत करना होगा।
क्योंकि इस “शांतिदूत” की भूमिका के पीछे छिपी रणनीति को समझना ही आने वाले समय की सबसे बड़ी कूटनीतिक आवश्यकता है।
