बी के झा
NSK

पटना/ नई दिल्ली, 16 अक्टूबर
बिहार की राजनीति एक बार फिर अप्रत्याशित मोड़ पर खड़ी है।जहां एक ओर महागठबंधन (RJD-कांग्रेस-लेफ्ट) में सीट शेयरिंग को लेकर चर्चाएं जारी हैं,वहीं कांग्रेस पार्टी ने गठबंधन के औपचारिक समझौते से पहले ही अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है।यह कदम न केवल महागठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े करता है,बल्कि कांग्रेस के अंदर उभरती ‘स्वतंत्र पहचान’ की रणनीति को भी उजागर करता है।
कांग्रेस ने जारी की पहली लिस्ट — प्रदेश अध्यक्ष समेत कई उम्मीदवार मैदान में बिहार कांग्रेस ने बुधवार देर रात अपने सोशल मीडिया हैंडल X (पूर्व ट्विटर) पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा करते हुए राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी।
घोषणाओं के साथ उम्मीदवारों को नामांकन प्रमाणपत्र सौंपते हुए तस्वीरें भी साझा की गईं —जो यह संकेत देती हैं कि कांग्रेस ने अब ‘इंतजार की राजनीति’ छोड़, ‘निर्णय की राजनीति’ अपनाने का फैसला कर लिया है।सूत्रों के मुताबिक,प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम कुटुंबा सीट से मैदान में उतरेंगे।शशि शेखर सिंह वजीरगंज से,कौशलेंद्र कुमार उर्फ छोटे मुखिया नालंदा से,त्रिशूलधारी सिंह बरबीघा से,प्रतिमा दास राजापाकड़ से चुनाव लड़ेंगी।
इसके अलावा—गोविंदगंज से शशि भूषण राय उर्फ गप्पू राय,मुजफ्फरपुर से विजेंद्र चौधरी,गोपालगंज से ओम प्रकाश गर्ग,अमरपुर से जितेंद्र सिंह,बेगूसराय से अमिता भूषण,सुल्तानगंज से ललन कुमार,रोसड़ा से बी.के. रवि,बछवाड़ा से युवा कांग्रेस अध्यक्ष प्रकाश गरीब दास,औरंगाबाद से आनंद शेखर सिंह को टिकट दिया गया है।
तेजस्वी के नामांकन के बीच कांग्रेस का ‘साइलेंट बम’दिलचस्प यह है कि कांग्रेस की यह घोषणा उसी दिन हुई,जब राजद नेता तेजस्वी यादव ने राघोपुर सीट से अपना नामांकन दाखिल किया।कांग्रेस ने यह कदम ठीक उसी समय उठाया जब सीट शेयरिंग पर दोनों दलों के बीचतनाव और सस्पेंस चरम पर था।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह कांग्रेस का साइलेंट बम है — जो न केवल लालू-तेजस्वी की रणनीति को चुनौती देता है,बल्कि यह संकेत भी देता है कि राहुल गांधी अब गठबंधन राजनीति के ‘आश्रित दौर’ से बाहर निकलना चाहते हैं।
बिहार कांग्रेस के लिए ‘जोखिम भरा लेकिन ज़रूरी’ दांव कांग्रेस का यह कदम जोखिम भरा लेकिन आवश्यक माना जा रहा है।
बिहार में पार्टी का जनाधार कमजोर है — पिछले चुनाव में उसे जो कुछ सीटें मिलीं,वे मुख्यतः RJD के वोट ट्रांसफर पर आधारित थीं।ऐसे में कांग्रेस का एकतरफा लिस्ट जारी करनाया तो उसे नए आत्मविश्वास का चेहरा देखा या गठबंधन से अलग-थलग कर सकता है।
एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा—हम अब किसी की दया पर नहीं रहना चाहते।कांग्रेस बिहार में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना चाहती है।गठबंधन हो या न हो, हम अपनी लड़ाई अपने दम पर लड़ेंगे।”
महागठबंधन में बढ़ी बेचैनी, RJD के खेमे में सन्नाटाRJD की तरफ से अब तक इस कदम पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है,लेकिन अंदरखाने की खबरें बताती हैं कि तेजस्वी यादव इससे नाखुश हैं।क्योंकि इससे पहले सीट शेयरिंग के अंतिम फॉर्मूले पर RJD-कांग्रेस के बीच तीन जेदौर की बैठक हो चुकी थी, लेकिन सहमति नहीं बन पाई थी।अब कांग्रेस की घोषणा ने साफ कर दिया है कि महागठबंधन के भीतर भरोसे की दीवार में दरारें पड़ चुकी हैं।
🔹 राहुल गांधी का संदेश — “कांग्रेस किसी की पिछलग्गू नहीं”कांग्रेस नेतृत्व ने यह फैसला पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी की सहमति से लिया है।दरअसल राहुल गांधी ने पिछले कुछ महीनों से लगातार इस बात पर जोर दिया है कि कांग्रेस को “अपने फैसले खुद लेने चाहिए, न कि सहयोगियों के आदेश पर।”पार्टी के अंदर इसे एक “स्वाभिमान की राजनीति” के रूप में देखा जा रहा है।लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह स्वाभिमान वोटों में तब्दील हो पाएगा?
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विशेषज्ञ प्रो. एन.के. झा का कहना है—कांग्रेस का यह कदम साहसिक जरूर है, लेकिन व्यावहारिक नहीं।बिहार में उसका वोट बैंक सीमित है और अगर वह गठबंधन से अलग होती है तो नुकसान उसी का होगा।”वहीं एक अन्य विश्लेषक डॉ. रंजीत सिंह का कहना है—यह राहुल गांधी का पॉलिटिकल मेसेज है कि कांग्रेस अब ‘फॉलोअर’ नहीं, बल्कि ‘लीडर’ बनना चाहती है।बिहार में इसका असर राष्ट्रीय स्तर पर भी दिखेगा।”
अब सवाल: क्या बिखर जाएगा महागठबंधन?बिहार में 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में मतदान और14 नवंबर को मतगणना होगी।ऐसे में कांग्रेस की यह जल्दबाजी महागठबंधन की एकता को कमजोर कर सकती है।अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि क्या लालू-तेजस्वी राहुल के पास जाकर समझौते की कोशिश करेंगे,या फिर बिहार में विपक्ष दो खेमों में बंट जाएगा।
निष्कर्ष: ‘
स्वाभिमान’ बनाम ‘सर्वाइवल’ की जंटी कांग्रेस ने बिहार में अपनी स्वतंत्र राह चुन ली है।लेकिन यह राह कांटों भरी है —जहां एक तरफ आत्मनिर्भरता की छवि है,वहीं दूसरी ओर संगठनात्मक कमजोरी और जनाधार की चुनौती भी।
अब देखना यह होगा कि राहुल गांधी का यह “स्वाभिमान प्रयोग”कांग्रेस को नई पहचान दिलाएगा या महागठबंधन की राजनीति में उसकी लुटिया डुबो देगा।
