“बिहार में फिर लौटेगा खौफ?” राजद ने शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा को दिया टिकट, भड़की भाजपा

बी के झा

NSK

सीवान / पटना /नई दिल्ली, 16 अक्टूबर

बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और सियासी तापमान अपने चरम पर है।

लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रही है — सीवान की रघुनाथपुर विधानसभा सीट, जहां से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने दिवंगत बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब को उम्मीदवार बनाया है।जैसे ही ओसामा को टिकट मिलने की घोषणा हुई,

राजनीतिक हलकों में भूचाल आ गया। विपक्ष, खासकर भाजपा, ने इसे “बिहार में फिर से खौफ की राजनीति लाने की कोशिश” बताया है।

भाजपा का तीखा हमला — “शहाबुद्दीन के आतंक को बिहार नहीं भूलेगा”भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा,राजद ने क्या संदेश देने की कोशिश की है? क्या वे फिर से बिहार में वही डर और दहशत का माहौल लाना चाहते हैं?

जब शहाबुद्दीन के ऊपर लालू प्रसाद यादव का हाथ था, तब सीवान में किसी पत्रकार या आम आदमी के लिए घुसना मुश्किल होता था — चाहे हिंदू हो या मुसलमान, सभी भयभीत थे।”भाजपा नेताओं ने इसे “राजद की वापसी पुरानी शैली की राजनीति” बताया है और कहा है कि यह बिहार के मतदाताओं के लिए चेतावनी की घंटी है।

RJD का दांव — भावनाओं और विरासत पर खेलराजद ने ओसामा को टिकट देकर न सिर्फ सीवान की राजनीतिक परंपरा को पुनर्जीवित करने की कोशिश की है, बल्कि मुस्लिम–यादव समीकरण (MY Factor) को भी फिर से साधने का प्रयास किया है।ओसामा के मैदान में उतरने से पार्टी का पारंपरिक वोटबैंक एक बार फिर सक्रिय दिखाई दे रहा है।

राजद के एक स्थानीय नेता ने कहा —ओसामा साहब को लोग उनके पिता की तरह ही देखते हैं। शहाबुद्दीन साहब ने चाहे जैसे भी हों, उन्होंने सीवान को पहचान दी थी। अब उनका बेटा उसी विरासत को आगे बढ़ाएगा।”

सीवान का रघुनाथपुर: सत्ता की सीढ़ी या सियासत का रणक्षेत्र रघुनाथपुर विधानसभा सीट इस बार पूरे बिहार की नजरों का केंद्र बन गई है।

यहाँ मुकाबला तीन तरफा माना जा रहा है —राजद से ओसामा शहाब,जदयू से विकास कुमार सिंह उर्फ जीशु सिंह,और जनसुराज पार्टी से राहुल कीर्ति सिंह।दिलचस्प बात यह है कि तीनों उम्मीदवार पहली बार चुनावी मैदान में हैं।जदयू और भाजपा के बीच इस सीट को लेकर लंबी खींचतान चली थी, लेकिन अंततः यह सीट जदयू के खाते में गई।

पृष्ठभूमि:

एक नाम, जिसने सीवान की राजनीति को परिभाषित किया सीवान और शहाबुद्दीन — ये दो नाम बिहार की राजनीति में लंबे समय तक पर्याय रहे।कभी आरजेडी के सबसे ताकतवर नेताओं में गिने जाने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन पर हत्या, अपहरण, और रंगदारी जैसे कई गंभीर आरोप थे।

उनका प्रभाव इतना था कि कहा जाता था — “सीवान में सूरज भी शहाबुद्दीन की इजाज़त से उगता है।”2017 में शहाबुद्दीन की मौत के बाद राजनीति में एक खालीपन था, जिसे अब ओसामा भरने की कोशिश कर रहे हैं।

ओसामा का राजनीतिक सफर: ‘विरासत’ से ‘वोटबैंक’ तक ओसामा शहाब, पिता की छवि के साए में पले-बढ़े हैं।राजनीति में कदम रखने से पहले वे ज्यादा सार्वजनिक मंचों पर नहीं दिखाई देते थे।लेकिन अब उनका चेहरा राजद के प्रचार पोस्टरों पर सबसे प्रमुखता से दिख रहा है।ओसामा ने अपने पहले भाषण में कहा —मैं अपने पिता की विरासत को बिहार की सेवा में बदलना चाहता हूं। जनता का डर नहीं, भरोसा जीतना मेरा लक्ष्य है।

जनता की राय — ‘डर और उम्मीद के बीच’सीवान की गलियों में जब लोगों से पूछा गया कि ओसामा के मैदान में उतरने पर क्या सोचते हैं, तो जवाब मिला-जुला था।एक बुजुर्ग दुकानदार बोले —शहाबुद्दीन के वक्त डर भी था, लेकिन कानून-व्यवस्था भी थी। अब देखना है बेटा क्या करता है।

वहीं एक युवा ने कहा —“हम पुराने खौफ नहीं चाहते, हमें रोजगार और शांति चाहिए।”

राजनीतिक विश्लेषक क्या कहते हैं

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजद का यह दांव जोखिम भरा लेकिन रणनीतिक है। सीवान की सामाजिक बनावट में मुस्लिम और यादव वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यदि ओसामा इन समुदायों को एकजुट करने में सफल रहे, तो वे इस सीट पर मजबूत चुनौती पेश कर सकते हैं। लेकिन भाजपा-जदयू गठबंधन इसे “अपराध और अराजकता की वापसी” के तौर पर पेश करने की कोशिश करेगा।

निष्कर्ष

सीवान की रघुनाथपुर सीट इस बार सिर्फ एक चुनाव क्षेत्र नहीं, बल्कि बिहार की सियासी सोच की परीक्षा बन गई है।क्या जनता “विरासत” चुनेगी या “विकास”?क्या ओसामा शहाब अपने पिता की छाया से बाहर निकल पाएंगे?

और सबसे बड़ा सवाल — क्या बिहार में फिर से “खौफ की राजनीति” लौटेगी या एक नई शुरुआत होगी?

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