बी के झा
NSK

नई दिल्ली , 16 अक्टूबर
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है जब कोलेजियम ने सरकार के कहने पर अपने निर्णय में बदलाव किया। इस मामले ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। केंद्र में है मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन का स्थानांतरण।
क्या है पूरा मामला
25 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने निर्णय लिया था कि जस्टिस अतुल श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में स्थानांतरित किया जाएगा। लेकिन, केंद्र सरकार ने कोलेजियम से कहा कि वह इस फैसले पर “पुनर्विचार” करे — जो कि परंपरागत रूप से असामान्य कदम है।सरकार की इस आपत्ति के बाद 14 अक्टूबर को कोलेजियम ने अपना फैसला बदलते हुए जस्टिस श्रीधरन का ट्रांसफर इलाहाबाद हाईकोर्ट में करने की सिफारिश कर दी।कोलेजियम की आधिकारिक विज्ञप्ति में स्पष्ट लिखा गया —सरकार के अनुरोध पर पुनर्विचार के बाद, कोलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन के स्थानांतरण को छत्तीसगढ़ से इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए संशोधित किया है।
क्यों है यह मामला खास यह सिर्फ एक ट्रांसफर नहीं, बल्कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के रिश्तों में झलकते तनाव की झांकी है।इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यदि जस्टिस श्रीधरन को छत्तीसगढ़ भेजा जाता, तो वे वहाँ दूसरे सबसे वरिष्ठ जज बनते — जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनकी सीनियरिटी सातवें स्थान पर होगी।कानूनी हलकों में इसे “सीनियरिटी में डिमोशन” के रूप में देखा जा रहा है।
कौन हैं जस्टिस अतुल श्रीधरन जस्टिस, श्रीधरन वर्ष 2016 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज बने।उनका करियर कई अहम मामलों से जुड़ा रहा है —कश्मीर में कार्यरत रहते हुए उन्होंने पब्लिक सेफ्टी एक्ट (PSA) के तहत हिरासत के मामलों की न्यायिक समीक्षा की बात कही थी।मध्य प्रदेश में उन्होंने कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर मंत्री विजय शाह के विवादित बयान पर स्वतः संज्ञान लिया और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया।उन्होंने “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद सेना के अधिकारियों की गरिमा की रक्षा के लिए भी कड़ा रुख अपनाया था।बतौर वकील, जस्टिस श्रीधरन ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम के चैंबर में पांच साल तक कार्य किया। बाद में वे इंदौर में स्वतंत्र रूप से वकालत करने लगे।2023 में उन्होंने स्वेच्छा से स्थानांतरण की मांग की थी क्योंकि उनकी बेटी ने इंदौर में वकालत शुरू की थी। उन्हें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट भेजा गया था, जहाँ से 2025 में उन्हें पुनः मध्य प्रदेश हाईकोर्ट बुला लिया गया।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर नई बहसकोलेजियम का सरकार के कहने पर फैसला बदलना न्यायपालिका की स्वायत्तता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि सरकार को कोलेजियम के निर्णयों में “रिव्यू” का अप्रत्यक्ष अधिकार मिल गया, तो यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के मूल ढांचे को कमजोर कर सकता है।एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा —यह एक खतरनाक मिसाल है। यदि सरकार को अब कोलेजियम के निर्णयों पर दोबारा विचार के लिए कहने का रास्ता मिल गया, तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल कागज पर रह जाएगी।”
राजनीतिक हलकों में बवाल तय
मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई के इस स्वीकारोक्ति के बाद कि कोलेजियम ने सरकार के अनुरोध पर फैसला बदला, राजनीतिक दलों में उबाल आना स्वाभाविक है। विपक्ष इसे “न्यायपालिका पर अप्रत्यक्ष दबाव” बताकर केंद्र को घेरने की तैयारी में है, वहीं सरकार इसे “सहयोग और परामर्श की सामान्य प्रक्रिया” कह सकती है।
निष्कर्ष
जस्टिस अतुल श्रीधरन का ट्रांसफर अब सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रहा — यह उस नाजुक रेखा की याद दिलाता है जहाँ न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच की स्वतंत्रता की कसौटी तय होती है।
क्या यह सिर्फ एक “संयोग” है या कोई “संकेत” — इस पर देश की नज़रें टिकी हैं।
