क्या नीतीश कुमार नहीं बनेंगे फिर से बिहार के मुख्यमंत्री? अमित शाह के बयान से बढ़ी सियासी हलचल, कहा– “विधायक दल करेगा फैसला”

बी के झा

NSK

पटना / नई दिल्ली, 16 अक्टूबर

बिहार की सियासत में हलचल एक बार फिर तेज़ हो गई है। विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही इस बात पर राजनीतिक गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि क्या इस बार नीतीश कुमार दोबारा मुख्यमंत्री बन पाएंगे या नहीं?

इस सस्पेंस के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पटना में एक मीडिया कार्यक्रम के दौरान बड़ा बयान देकर सियासी तापमान और बढ़ा दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि एनडीए की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद का फैसला विधायक दल करेगा।

विधायक दल चुनेगा अपना नेता – शाहअमित शाह ने कहा, “मैं किसी को मुख्यमंत्री बनाने वाला कौन होता हूं। इतनी सारी पार्टियों का गठबंधन है। चुनाव के बाद विधायक दल की बैठक होगी और वही अपना नेता तय करेगा।

फिलहाल हम नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ रहे हैं और वही हमारे चुनाव अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं।”शाह ने यह भी जोड़ा कि नीतीश कुमार पर सिर्फ बीजेपी को ही नहीं बल्कि बिहार की जनता को भी भरोसा है।हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि अगर चुनाव में बीजेपी को अधिक सीटें मिलती हैं तो क्या तब भी नीतीश ही मुख्यमंत्री रहेंगे, इस पर शाह ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया –“हमारे पास अभी भी ज्यादा विधायक हैं, फिर भी नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री हैं।”

नीतीश जन्म से कांग्रेस विरोधी रहे हैं” – अमित शाह का राजनीतिक विश्लेषण

अमित शाह ने नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार मूल रूप से समाजवादी विचारधारा के नेता हैं और “बचपन से ही कांग्रेस के विरोध में रहे हैं।”शाह ने जेपी आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि नीतीश ने आपातकाल के दौरान कांग्रेस के खिलाफ खुलकर मोर्चा संभाला था।उन्होंने कहा, “नीतीश का कांग्रेस के साथ जुड़ाव कभी लंबा नहीं रहा, जब भी रहे, वह समय ढाई साल से ज्यादा नहीं था। उन्हें उनके राजनीतिक जीवन के संपूर्ण संदर्भ में देखना चाहिए।”

क्या अमित शाह के बयान से खुला भविष्य का रास्ता?

अमित शाह का यह बयान भले ही “संतुलित” प्रतीत हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे संकेतों की राजनीति के रूप में देखा जा रहा है।सियासी विश्लेषक मानते हैं कि शाह ने साफ तौर पर यह संदेश दिया है कि विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री का ताज किसे मिलेगा, यह तय होगा बीजेपी और सहयोगियों के निर्वाचित विधायकों की संख्या के अनुपात में।यानी, यह रास्ता अब उतना सहज नहीं रहा जितना पहले था।

जेडीयू के भीतर भी मचा सियासी मंथन

जानकारों के मुताबिक, जेडीयू के भीतर भी इस बयान को लेकर बेचैनी है।पार्टी के वरिष्ठ नेता अजय मंडल पहले ही चेतावनी दे चुके थे कि पार्टी के अंदर कुछ “षड्यंत्रकारी ताकतें” सक्रिय हैं जो बीजेपी के साथ मिलकर जेडीयू को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं।

अजय मंडल का इशारा सीधे-सीधे संजय झा, ललन सिंह और विजय कुमार सिन्हा की ओर माना जा रहा है।मंडल जैसे भरोसेमंद नेताओं को टिकट से वंचित करना भी नीतीश के निर्णयों पर सवाल खड़े करता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश ने अपने पुराने विश्वासपात्रों को दरकिनार कर, रणनीतिक तौर पर खुद की स्थिति कमजोर कर ली है।

क्या मोदी की पसंद हैं चिराग पासवान?

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नजर अब बिहार की नई पीढ़ी के नेतृत्व की ओर है।लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान को लेकर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व में “सकारात्मक दृष्टिकोण” देखा जा रहा है।

कई राजनीतिक विश्लेषकों ने यह तक कहा कि “अगर मोदी की पहली पसंद बिहार में किसी पर भरोसे की है, तो वह चिराग पासवान हैं।”अमित शाह के आज के बयान को कुछ लोगों ने इसी इशारे के रूप में देखा है — कि भविष्य की राजनीति में चिराग की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

आगे की राह: जेडीयू के लिए परीक्षा की घड़ीअब सवाल यह है कि जेडीयू और नीतीश कुमार इस सियासी संकेत को कैसे लेते हैं?क्या वे बीजेपी के नेतृत्व पर भरोसा रखेंगे या एक बार फिर किसी “थर्ड फ्रंट” की तलाश करेंगे?सियासत के जानकार मानते हैं कि यह चुनाव केवल नीतीश कुमार की राजनीतिक प्रासंगिकता की परीक्षा नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि बिहार की सत्ता का चेहरा 2025 के बाद कौन होगा —नीतीश, चिराग या कोई तीसरा चेहरा।

निष्कर्ष:

अमित शाह का बयान एक वाक्य नहीं, बल्कि बिहार की सियासत की अगली पटकथा का संकेत है।अब निगाहें केवल चुनाव परिणामों पर नहीं, बल्कि उस “विधायक दल की बैठक” पर भी टिकी होंगी — जहाँ तय होगा कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा।

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