पीएम मोदी की ‘चाय पे चर्चा’ से लेकर नीतीश के ‘कैबिनेट’ तक… अब ‘जन सुराज’ से नई मंज़िल तलाश रहे प्रशांत किशोर

बी के झा

NSK

पटना / नई दिल्ली, 17 अक्टूबर

कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘चाय पे चर्चा’ के सूत्रधार रहे, तो कभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कैबिनेट का हिस्सा बने — प्रशांत किशोर उर्फ पीके अब बिहार की सियासत में अपनी अलग राह तलाश रहे हैं।

राजनीति के इस ‘मास्टर स्ट्रैटेजिस्ट’ ने जिन नेताओं को कभी सत्ता की सीढ़ियां चढ़ाईं, आज उन्हीं के सिस्टम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनकी पार्टी ‘जन सुराज’ अब एक नए राजनीतिक प्रयोग के रूप में बिहार की ज़मीन पर दस्तक दे चुकी है।

चाय से शुरू हुई कहानी, सत्ता तक पहुंची रणनीति

पीके की कहानी एक अनोखी शुरुआत से होती है। संयुक्त राष्ट्र में काम करने के बाद 2013-14 में वे गुजरात लौटे और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ‘सिटिज़न्स फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (CAG)’ नाम का संगठन बनाया।यहीं से निकला वह विचार जिसने भारतीय राजनीति की भाषा बदल दी — “चाय पे चर्चा।”

यह अभियान सिर्फ प्रचार नहीं था, बल्कि ‘एक आम आदमी के नेता’ की छवि गढ़ने की कला थी।

3डी होलोग्राम रैलियां, ‘रन फॉर यूनिटी’, ‘मंथन’ जैसे नवाचारों ने चुनावी मैदान में क्रांति ला दी।नतीजा सबके सामने था — 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 282 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की।

प्रशांत किशोर तब मोदी टीम के “ब्रेन ट्रस्ट” कहे जाते थे। मगर राजनीति का पहिया यहीं नहीं रुका।नीतीश के खेमे में प्रवेश — और ‘बिहार में बहार’ का दौर2014 के बाद प्रशांत किशोर ने भाजपा से दूरी बनाई। जल्द ही उनकी मुलाकात नीतीश कुमार से हुई — और यही उनकी दूसरी राजनीतिक innings की शुरुआत थी।2015 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने लालू-नीतीश गठबंधन को रणनीतिक रूप से एकजुट किया।

‘बिहार में बहार है, नीतीश कुमार है’ — इस नारे ने जनमानस में गूंज पैदा की।

परिणाम? महागठबंधन ने 243 में से 178 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की।जीत के बाद नीतीश कुमार ने पीके को जेडीयू का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया और कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया।राजनीतिक गलियारों में उन्हें “बिहारी चाणक्य” कहा जाने लगा — वह शख्स जो परदे के पीछे से चुनावों की पटकथा लिखता है।

फिर क्यों टूटा रिश्ता?

मतभेद से मनभेद तक2019 आते-आते सब कुछ बदल गया। एनआरसी और सीएए पर पीके ने खुलकर नीतीश सरकार की आलोचना की।

जवाब में जेडीयू ने उन्हें ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ के आरोप में निकाल दिया।नीतीश कुमार ने कहा, “अमित शाह के कहने पर उन्हें शामिल किया था।”

पीके ने पलटवार किया — “नीतीश कुमार झूठ बोल रहे हैं।”यही वह क्षण था जब दोनों के रास्ते हमेशा के लिए अलग हो गए।‘जन सुराज’ — एक नया राजनीतिक प्रयोग नीतीश से अलग होने के बाद प्रशांत किशोर ने राजनीतिक सलाहकार के रूप में कई राज्यों में काम किया — पंजाब में कैप्टन अमरिंदर के साथ, बंगाल में ममता बनर्जी के साथ, और तमिलनाडु में स्टालिन के साथ। लेकिन उनका मन बिहार में ही अटका रहा।

2022 में उन्होंने ‘जन सुराज’ अभियान की नींव रखी — एक 3,000 किलोमीटर से अधिक की पदयात्रा, गांव-गांव संवाद और मुद्दे: बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य।2024 में यह अभियान एक राजनीतिक दल ‘जन सुराज पार्टी’ के रूप में बदल गया।

पीके ने वादा किया —नीतीश-लालू के 35 सालों में बिहार पिछड़ा। अब बिहारियों का राज आएगा। दस साल में बिहार को विकसित राज्य बनाना है।”

चुनावी समीकरण:

महिलाओं, युवाओं और ईबीसी पर फोकस पीके ने 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं — और खास बात यह कि महिलाओं और ईबीसी वर्ग को बड़ी हिस्सेदारी दी है।उनकी रणनीति सामाजिक समीकरणों की नई व्याख्या कर रही है हिंदू-मुस्लिम, अगड़ा-पिछड़ा से आगे बढ़कर “बिहारी बनाम व्यवस्था” की राजनीति।

वो नीतीश सरकार पर सीधा हमला करते हैं, कहते हैं —राजद का जंगलराज, नीतीश की भ्रष्ट व्यवस्था और बीजेपी की हिटलरशाही — तीनों से बिहार को मुक्ति चाहिए।”आरोपों पर बोले पीके — ‘मैं दुकान नहीं, आंदोलन चला रहा हूं’जब उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने राघोपुर सीट से चुनाव न लड़ने का फैसला क्यों किया, और क्या यह तेजस्वी यादव से किसी ‘सौदे’ का नतीजा है, तो पीके कुछ पल के लिए ठहर गए।फिर बोले —विरोधी मेरे जन समर्थन से घबराए हैं। इसलिए तरह-तरह के आरोप लगाते हैं।मैं न किसी के लिए दुकान चला रहा हूं, न किसी से सौदा किया है।

मैंने पहले ही कह दिया है — ना मैं चुनाव लड़ूंगा, ना कोई पद लूंगा।मैं सिर्फ बिहार और बिहारियों के हक की आवाज़ बनूंगा।”

राजनीतिक विश्लेषकों की राय — ‘अगर 10 सीट भी मिलीं, तो इतिहास बदल जाएगा’

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति में “विचार की राजनीति” की नई शुरुआत की है।भले ही उनकी पार्टी पहली बार मैदान में है, लेकिन उनका प्रभाव दिखने लगा है।

एक वरिष्ठ विश्लेषक ने कहा —अगर जन सुराज 5 से 10 सीटें भी जीत गई, तो बिहार की राजनीति का समीकरण बदल जाएगा।पीके आने वाले वर्षों में ‘किंगमेकर’ नहीं, खुद ‘किंग’ भी बन सकते हैं।

”निष्कर्ष

रणनीतिकार से जननेता तक का सफर

प्रशांत किशोर की कहानी भारतीय राजनीति के सबसे दिलचस्प सफरों में से एक है —एक ऐसा शख्स जिसने दूसरों को सत्ता दिलाई, अब खुद जनता की अदालत में उतर आया है।उनकी पदयात्रा से निकला संदेश साफ़ है —“बिहार अब एजेंडा नहीं, विज़न मांगता है।”अब देखना यह है कि क्या यह विज़न वोट में तब्दील होगा या पीके फिर किसी और की राजनीतिक कहानी के अध्याय बनकर रह जाएंगे।

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