नशे में धुत थानेदार ने पुलिस टीम की ऐसी-तैसी कर दी, जीप छीनी — दारोगा और सिपाही पैदल लौटे थाने! मुजफ्फरपुर के बोचहां थाना की घटना से फटी शराबबंदी की पोल — बिहार में कानून और शराब दोनों बेखौफ़!

बी के झा

NSK

मुजफ्फरपुर / नई दिल्ली, 26 अक्टूबर

बिहार में शराबबंदी कानून का हाल एक बार फिर शर्मनाक सुर्खियों में है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सख्त शराबबंदी नीति के बावजूद, मुजफ्फरपुर जिले के बोचहां थाना के थानेदार खुद शराब के नशे में धुत पाए गए — और बात यहीं खत्म नहीं हुई।

उन्होंने तो अपने ही दारोगा और पुलिस टीम की “ऐसी-तैसी” कर दी।थानेदार ने गाड़ी रोकी, दारोगा को उतारा, गालियां दीं और सरकारी जीप लेकर फरार हो गए — नतीजा यह कि कानून की रखवाली करने वाले जवानों को ही डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर थाना लौटना पड़ा!

थानेदार की करतूत: नशे में गालियां, गाड़ी छीनी, टीम को उतारा यह मामला शुक्रवार रात का है। बोचहां थाना के दारोगा प्रमोद पांडेय ने अपनी शिकायत में लिखा है कि वह 9:43 बजे थाने में बैठकर एक केस का निष्पादन कर रहे थे, तभी डायल 112 पर सूचना मिली कि शरवानी चक गांव में एक युवक और युवती को कुछ लोग बांधकर मार रहे हैं।

दारोगा ने तुरंत पुलिस टीम को तैयार किया और मौके पर रवाना होने लगे। लेकिन जब थानेदार साहब से संपर्क करने की कोशिश की गई — वे नदारद थे! फोन लगाया गया, कॉल उठी नहीं। तब दारोगा ने कर्तव्यनिष्ठा दिखाते हुए बिना देर किए थाने की गाड़ी लेकर निकल पड़े।लेकिन जैसे ही पुलिस टीम गांव के रास्ते में पहुंची — सामने थानेदार साहब प्रकट हुए।

थानेदार ने टीम की गाड़ी रोक ली, गुस्से में गालियां बकीं और बोले — “मेरे आदेश के बिना गाड़ी लेकर निकलने की हिम्मत कैसे हुई?”

इसके बाद, उन्होंने पूरे दारोगा दल को गाड़ी से उतार दिया और सरकारी जीप लेकर खुद थाना लौट गए!

दारोगा, सिपाही और ड्राइवर को मजबूर होकर 1.5 किलोमीटर पैदल वापस लौटना पड़ा।दारोगा की शिकायत में गंभीर आरोप दारोगा

प्रमोद पांडेय ने एसएसपी को भेजी शिकायत में लिखा है कि थानेदार नशे में धुत थे और इसीलिए उन्होंने अनुशासन की सारी सीमाएं लांघ दीं।दारोगा के अनुसार, “थानेदार शराब के प्रभाव में थे और उनकी जुबान से शराब की बदबू साफ आ रही थी। उन्होंने अपशब्द कहे और कहा कि आगे से मेरे बिना कोई गाड़ी नहीं निकलेगी, चाहे कोई मर भी जाए।”इस घटना के बाद, डायल 112 पर आई युवक-युवती की पिटाई की शिकायत पर कार्रवाई ही नहीं हो सकी, क्योंकि जिम्मेदार पुलिसकर्मी पैदल थाने लौट रहे थे।

एसएसपी ने दिया जांच का आदेश

दारोगा की शिकायत के बाद एसएसपी सुशील कुमार ने ग्रामीण एसपी को जांच कर सख्त कार्रवाई का निर्देश दिया है।हालांकि, सूत्रों का कहना है कि थानेदार राजनीतिक पहुंच वाले अफसर हैं, इसलिए विभागीय कार्रवाई पर अभी भी सस्पेंस बना हुआ है।“

कागजों में शराबबंदी, ज़मीन पर शराबबंदी का मज़ाक” —

बुद्धिजीवी वर्ग का कटाक्ष

घटना के बाद बिहार की कानून-व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विपक्षी दलों से लेकर बुद्धिजीवी वर्ग तक का कहना है कि —नीतीश कुमार के बिहार में शराबबंदी सिर्फ सरकारी फाइलों में है, हकीकत में तो हर थाना खुद ‘मिनी बार’ बन चुका है।”

एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने व्यंग्य करते हुए कहा,आज बिहार में शराबबंदी तो नहीं, लेकिन ‘शराबबंदी पर बंदिश लगाने वाले’ जरूर नशे में दिखते हैं। गरीब आदमी अगर पकड़ा जाए तो जेल, लेकिन अफसर अगर पी ले, तो प्रमोशन

!राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार में शराबबंदी कानून ने भ्रष्टाचार का नया उद्योग खड़ा कर दिया है।अब शराब नहीं, शराब की जांच से कमाई होती है। पुलिस वाले गरीबों पर डंडा चलाते हैं, जबकि शराब कारोबारी थाने में ‘सेटिंग’ कर लेता है,”

एक विश्लेषक ने कहा।बिहार की सच्चाई: कानून के रखवाले ही बन गए कानून तोड़ने वाले

मुजफ्फरपुर की यह घटना कोई अकेला मामला नहीं। सूबे के कई जिलों में शराबबंदी के नाम पर पुलिस की मनमानी, भ्रष्टाचार और शक्ति के दुरुपयोग की शिकायतें बढ़ती जा रही हैं।

सरकार दावा करती है कि शराबबंदी “समाज सुधार” का कदम है, लेकिन आज यही कानून बिहार के गरीबों को जकड़ने का हथियार और अफसरों के लिए धनार्जन का जरिया बन चुका है।

उदाहरण:

बोचहां थाना की सड़क पर पैदल लौटते दारोगा और सिपाही — थानेदार साहब नशे में गाड़ी लेकर निकल गए थे, कर्तव्य पीछे छूट गया !

उदाहरण

शराबबंदी की नई मिसाल — थानेदार पीता है, जनता भुगतती है”

“बिहार में शराबबंदी नहीं, ‘शराबबंधु’ नीति चल रही है”

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