बी के झा
NSK

पटना / पूर्णिया / कटिहार /नई दिल्ली, 27 अक्टूबर
बिहार विधानसभा चुनाव की आहट के बीच पूर्णिया में सोमवार को जनसुराज प्रमुख प्रशांत किशोर (PK) के काफिले को पुलिस द्वारा रोके जाने और तलाशी लेने की घटना ने राज्य की राजनीति में नया बवंडर खड़ा कर दिया है।वहीं दूसरी ओर कटिहार के बारसोई में एक भाई-बहन के साथ पुलिस की बदसलूकी का वीडियो वायरल होने से बिहार पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं।इन दोनों घटनाओं ने नीतीश सरकार, गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।
घटना:
पूर्णिया में प्रशांत किशोर का काफिला रोका गयासूत्रों के मुताबिक, जनसुराज यात्रा के तहत प्रशांत किशोर सोमवार को पूर्णिया के कई इलाकों में प्रचार कर रहे थे।इसी दौरान उनके काफिले को पुलिस ने अचानक चेकिंग अभियान के नाम पर रोक लिया।
पुलिस ने प्रचार वाहनों की तलाशी ली और कई दस्तावेजों की जांच-पड़ताल की।इस कार्रवाई के कारण कुछ देर तक मौके पर अफरा-तफरी मच गई और कार्यकर्ताओं में रोष फैल गया।मीडिया से बातचीत में प्रशांत किशोर ने सीधे-सीधे नीतीश सरकार और गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधा।उन्होंने कहा अमित शाह ने कुछ निष्पक्ष पत्रकारों पर इतना अधिक दबाव डाल दिया है कि वे सभी बिहार चुनाव कवरेज करने आने से अपने आपको अलग कर लिया,
उन्होंने कहा—जनसुराज के बढ़ते जनाधार से बीजेपी और एनडीए इतना घबरा गए हैं कि अब हमारे प्रचार को रोकने और कार्यकर्ताओं को डराने की कोशिश की जा रही है।यह सब अमित शाह के इशारे पर किया जा रहा है।लेकिन मैं और मेरे साथी डरने वाले नहीं हैं।बिहार की जनता अब नफरत और बांटने की राजनीति को जवाब देने के लिए तैयार है।”
राजनीतिक विश्लेषकों ने उठाए सवाल
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि चुनावी माहौल में ऐसी कार्रवाई प्रशासनिक निष्पक्षता पर सीधा प्रहार करती है।पूर्णिया जैसे सेंसिटिव क्षेत्र में जहां प्रशांत किशोर की सभाओं में बड़ी भीड़ उमड़ रही है,वहीं पुलिस द्वारा इस तरह की जांच को कई विश्लेषक “राजनीतिक दखल का संकेत” मान रहे हैं।
राजनीति विशेषज्ञ प्रो. एस.एन. झा ने कहा —यह सिर्फ एक तलाशी नहीं, बल्कि सत्ता का डर है।चुनाव आयोग को तुरंत संज्ञान लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश देने चाहिए कि प्रचार के दौरान विपक्षी दलों को परेशान न किया जाए।”
कटिहार में पुलिस की ‘बदसलूकी’: रेस्टोरेंट में भाई-बहन से अभद्र व्यवहारइधर, इसी दिन कटिहार के बारसोई थाना क्षेत्र से एक और विवादास्पद घटना सामने आई।एक रेस्टोरेंट में बैठे भाई-बहन के साथ थानाध्यक्ष रामचंद्र मंडल और उनके सहयोगी पुलिसकर्मियों ने कथित रूप से अभद्रता की,जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
पीड़ित यश अग्रवाल ने बताया —24 अक्टूबर की शाम मैं अपनी बहन के साथ खाना खाने गया था।तभी एसओ बारसोई कुछ पुलिसकर्मियों के साथ पहुंचे।उन्होंने हमसे बदसलूकी की, और बिना वजह पूछताछ करने लगे।”
वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि जब यश ने कहा “यह मेरी बहन है”,तो थानाध्यक्ष भड़क उठे और बोले —इतना जोर से क्यों बोल रहे हो? तुम्हारा लहजा ठीक नहीं है।”इसी बात पर बहस शुरू हो गई, जो कुछ देर बाद झड़प में बदल गई।
पुलिस ने जारी की प्रेस रिलीजमामला तूल पकड़ने पर डीएसपी अजय कुमार ने कहा कि बारसोई थानाध्यक्ष को सूचना मिली थी कि इलाके में कुछ असामाजिक तत्व मौजूद हैं।जांच के दौरान कुछ कहासुनी हुई।थानाध्यक्ष को शोकॉज नोटिस जारी कर दिया गया है।उनका जवाब आने के बाद विभागीय कार्रवाई की जाएगी।”हालांकि, वीडियो के वायरल होने के बाद जनता और विपक्षी दलों ने इसे “सत्ता के दुरुपयोग” और “जनता को डराने की कोशिश” बताया।
प्रशासन पर उठे गंभीर सवालइन दोनों घटनाओं के बाद बिहार के राजनीतिक गलियारे में पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता और चुनाव आयोग की भूमिका पर तीखी बहस छिड़ गई है।जनसुराज समर्थकों का कहना है किजहाँ एक तरफ जनाधार बढ़ते ही PK के काफिले को रोका जा रहा है,वहीं जनता से जुड़ी छोटी-छोटी घटनाओं में भी पुलिस का रवैया मनमाना हो गया है।”
कांग्रेस, राजद और वाम दलों ने भी पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं,जबकि बीजेपी प्रवक्ताओं ने इसे “सामान्य जांच प्रक्रिया” बताते हुए “राजनीतिक साजिश” की बात से इनकार किया है।
निष्कर्ष:
सवाल जनता सेबिहार की धरती पर लोकतंत्र का उत्सव शुरू होने से पहले ही निष्पक्षता की कसौटी पर सवाल खड़े हो गए हैं।क्या पुलिस प्रशासन वाकई तटस्थ भूमिका निभा रहा है?या फिर शासन के दबाव में लोकतंत्र की धड़कनें कमजोर पड़ने लगी हैं?जनता अब यही पूछ रही है —अगर प्रचार रोकना, तलाशी लेना और डराना ही लोकतंत्र है,तो फिर चुनाव क्यों?
