SIR लिस्ट से असम क्यों हुआ बाहर? CEC ज्ञानेश कुमार ने बताई वजह — NRC और नागरिकता विवाद का जुड़ा गहरा रिश्ता

बी के झा

NSK

नई दिल्ली ,‌ 27 अक्टूबर

देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की दूसरी सूची जारी हो चुकी है। 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया शुरू होने जा रही है,

लेकिन असम — जो इस साल चुनाव की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य है — इस सूची से बाहर है।मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सोमवार को इस फैसले की विस्तृत वजह बताई, जो सीधे तौर पर नागरिकता कानून (Citizenship Act) और एनआरसी (NRC) से जुड़ी है।

असम के लिए अलग प्रावधान, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में प्रक्रियाCEC ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा —भारतीय नागरिकता कानून में असम के लिए विशिष्ट प्रावधान हैं। वहाँ नागरिकता सत्यापन की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में लगभग पूरी हो चुकी है। इस कारण SIR का राष्ट्रीय आदेश असम पर स्वतः लागू नहीं होता। राज्य के लिए अलग संशोधित दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।”इस बयान के साथ यह स्पष्ट हो गया कि असम का मामला सामान्य मतदाता सूची पुनरीक्षण से अधिक जटिल और संवेदनशील है।

नागरिकता कानून का सेक्शन 6A: असम का अलग संविधान जैसा प्रावधानअसम को विशेष दर्जा Citizenship Act, 1955 के Section 6A के तहत मिला हुआ है। यह प्रावधान असम समझौते (1985) के बाद जोड़ा गया था।

इसके अनुसार:1 जनवरी 1966 से पहले बांग्लादेश से असम आने वाले लोग भारतीय नागरिक माने जाते हैं।1 जनवरी 1966 से 25 मार्च 1971 के बीच आए लोगों को “नागरिकता के लिए पंजीकरण” की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।जबकि 25 मार्च 1971 के बाद आने वालों को अवैध प्रवासी (illegal migrant) माना जाता है।इन मामलों का निर्णय राज्य के Foreigners Tribunals करती हैं। यानी हर व्यक्ति की नागरिकता तय करने का काम अदालत-समान निकायों के हाथ में है — जो अपने आप में लंबी और जटिल प्रक्रिया है।

NRC की अधूरी कहानी:

19 लाख लोग सूची से बाहरअसम में नागरिकता की पहचान का सबसे बड़ा प्रयास राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) था, जिसे 2019 में प्रकाशित किया गया।उस सूची से 19 लाख से अधिक लोग बाहर रह गए — जिनमें से बड़ी संख्या गरीब, ग्रामीण और अल्पसंख्यक समुदायों की थी।सरकार का दावा था कि यह कदम अवैध प्रवासियों को चिन्हित करने के लिए था,

जबकि विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों ने कहा कि इसमें लाखों असली भारतीय नागरिक भी छूट गए।NRC को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि केंद्र ने आज तक उसकी अंतिम सूची को अधिसूचित नहीं किया।इस अधूरी प्रक्रिया के चलते, अब SIR जैसी किसी नई मतदाता सूची पुनरीक्षण कवायद को शुरू करना कानूनी और सामाजिक दोनों दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।

“असम में SIR की प्रक्रिया बेहद कठिन” —

CEC ज्ञानेश कुमार ने भी माना कि असम में मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया “बेहद कठिन और संवेदनशील” है।वहाँ नागरिकता का मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट के अधीन है। जब तक वहाँ की मौजूदा प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक SIR जैसी नई कवायद से भ्रम और विवाद पैदा हो सकता है,”उन्होंने कहा।

विपक्ष का हमला: ‘

गरीबों और वंचितों को सूची से बाहर करने की साजिश’असम में विपक्षी दलों ने पहले NRC और अब SIR को लेकर तीखे सवाल उठाए हैं।उनका आरोप है कि नागरिकता और मतदाता सूची की आड़ में गरीबों, प्रवासियों और अल्पसंख्यकों को वोटर लिस्ट से बाहर करने की कोशिश हो रही है।

कांग्रेस, एआईयूडीएफ और कई सामाजिक संगठनों ने कहा कि NRC में ही लाखों भारतीयों के नाम हटे —

SIR जैसी नई प्रक्रिया “एक और अन्याय” साबित होगी।हालांकि, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा —SIR का उद्देश्य किसी को बाहर करना नहीं, बल्कि सभी पात्र नागरिकों को सूची में शामिल करना है।”

SIR और NRC: दो समान दिखने वाली लेकिन अलग प्रक्रियाएँबिंदु SIR (Special Intensive Revision) NRC (National Register of Citizens)उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन और शुद्ध करना नागरिकता की कानूनी पुष्टि करना प्राधिकरण

चुनाव आयोग गृह मंत्रालय व सुप्रीम कोर्ट निगरानी कट-ऑफ वर्ष हालिया वोटर लिस्ट (2004) 24 मार्च 1971प्रभाव वोट डालने के अधिकार पर नागरिकता पर सीधा असर राज्य-स्तर पर लागू

पूरे देश में केवल असम में

विश्लेषण:

SIR से असम को अलग रखना समझदारी भरा कदमविशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग का यह निर्णय व्यावहारिक और संवैधानिक दृष्टि से संतुलित है।NRC जैसी प्रक्रिया से असम पहले ही सामाजिक विभाजन और अविश्वास की स्थिति झेल चुका है।ऐसे में जब तक नागरिकता से जुड़ी अदालतों की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, SIR लागू करने से नया विवाद खड़ा हो सकता था।असम में पहले नागरिकता की स्पष्टता जरूरी है, तभी मतदाता सूची का संशोधन तार्किक रूप से संभव है,”— संवैधानिक विशेषज्ञों का मत

निष्कर्ष

असम को SIR से बाहर रखना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि संवैधानिक विवेक का उदाहरण है।जहाँ देश के बाकी राज्यों में SIR लोकतंत्र को सशक्त करने की प्रक्रिया मानी जा रही है, वहीं असम के लिए यह एक संतुलन और संवेदनशीलता की परीक्षा है।नागरिकता की अंतिम परिभाषा तय होने के बाद ही वहाँ “मतदाता का अधिकार” सुरक्षित रूप से सुनिश्चित किया जा सकेगा।

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