बी के झा
NSK

पटना / न ई दिल्ली, 29 अक्टूबर
बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। लोकतंत्र का महापर्व कहे जाने वाले इस चुनाव में मतदाता एक बार फिर अपने प्रतिनिधियों को चुनने जा रहे हैं, लेकिन लोकतंत्र की चौखट पर अपराध और अरबों की संपत्ति का प्रभाव पहले से कहीं अधिक स्पष्ट रूप में नजर आ रहा है।एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और बिहार इलेक्शन वॉच की ताजा रिपोर्ट ने चुनावी अखाड़े की हकीकत उजागर कर दी है — जहां नैतिकता और सेवा की जगह अब दौलत, दबदबा और दागदार छवि ने कब्जा जमा लिया है।
40% उम्मीदवार करोड़पति — औसतन संपत्ति 3.26 करोड़ रुपयेरिपोर्ट के अनुसार इस बार बिहार विधानसभा की 243 सीटों पर उतरने वाले उम्मीदवारों में से 519 प्रत्याशी यानी लगभग 40% करोड़पति हैं।इनकी औसत घोषित संपत्ति ₹3.26 करोड़ है। कुछ प्रत्याशियों की संपत्ति तो छोटे उद्योगपतियों से भी अधिक बताई गई है।राजनीति अब समाज सेवा नहीं, बल्कि “कैपिटल इन्वेस्टमेंट” बन चुकी है — ऐसा मानना है चुनाव विशेषज्ञों का।
अपराध के साये में लोकतंत्र — 32% उम्मीदवारों पर आपराधिक केसएडीआर की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 423 उम्मीदवारों (32%) ने अपने हलफनामों में आपराधिक मामलों का खुलासा किया है।इनमें से 354 प्रत्याशी (27%) पर गंभीर अपराधों के आरोप हैं — हत्या, हत्या के प्रयास, महिलाओं के विरुद्ध अपराध और बलात्कार जैसे मामलों सहित।इन आंकड़ों में 33 उम्मीदवार हत्या के मामलों, 86 हत्या के प्रयास, और 42 महिला उत्पीड़न से जुड़े मामलों में आरोपी हैं।यह विडंबना ही है कि लोकतंत्र की सेवा का संकल्प लेकर खड़े कई उम्मीदवार खुद कानून की किताबों में अभियुक्त के रूप में दर्ज हैं।
पार्टीवार अपराधी उम्मीदवारों का रिपोर्ट कार्डरिपोर्ट के अनुसार—पार्टी उम्मीदवार आपराधिक मामले प्रतिशतभाकपा (CPI) 5 5 100%माकपा (CPM) 5 5 100%भाकपा (माले) 14 13 93%राजद 70 53 76%भाजपा 48 31 65%कांग्रेस 23 15 65%लोजपा (रामविलास) 13 7 54%जदयू 57 22 39%आम आदमी पार्टी 44 12 27%बसपा 89 18 20%जनसुराज पार्टी 114 50 44%यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि अपराध और राजनीति का गठबंधन अब किसी एक दल तक सीमित नहीं रहा — यह लोकतंत्र की सभी गलियों में गहराई तक पैठ चुका है।
शिक्षा में संतुलन, पर चरित्र में गिरावट उम्मीदवारों की शैक्षणिक स्थिति भी दिलचस्प है —519 उम्मीदवार (40%) ने कक्षा 5 से 12 के बीच की पढ़ाई की है,जबकि 651 उम्मीदवार (50%) स्नातक या उच्चतर डिग्रीधारी हैं।लेकिन सवाल यह है कि शिक्षा और संवेदना के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों?
शिक्षा तो बढ़ी, पर चरित्र का स्तर नीचे गिरा — ऐसा चुनावी विश्लेषक मानते हैं। अब टिकट काबिलियत पर नहीं, कुख्याति पर मिलता है” —
राजनीतिक विश्लेषक
एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए कहा —
आज राजनीति में वही टिकता है जो ताकतवर, प्रभावशाली और विवादित हो। दल उसी को टिकट देते हैं जो वोट बैंक को भय या प्रभाव से मोड़ सके। ऐसे में समाजसेवी या सुचिता वाले लोगों की जगह सिकुड़ती जा रही है।
”उन्होंने आगे जोड़ा —यह किसी एक पार्टी की कहानी नहीं है, सभी एक ही दौड़ में हैं — सत्ता की कुर्सी तक पहुँचने की, चाहे रास्ता कितना भी गंदा क्यों न हो।”
लोकतंत्र का आईना — अब मतदाता के विवेक की परीक्षाबिहार चुनाव की यह तस्वीर केवल उम्मीदवारों की नहीं, बल्कि जनता के विवेक की भी परीक्षा है।जब जनता अपराधी और बाहुबली उम्मीदवारों को वोट देती है, तो यह केवल व्यक्ति नहीं, लोकतंत्र की पवित्रता को भी दागदार करता है।अब देखना यह है कि 6 और 11 नवंबर को बिहार की जनता अपराध, अहंकार और अरबों की चमक पर आंखें मूंदती है या नई राजनीति की शुरुआत करती है।
निष्कर्ष:
बिहार की राजनीति आज crossroads पर है — एक तरफ पुरानी चाल-ढाल वाले बाहुबलियों की परंपरा, दूसरी ओर नई पीढ़ी की उम्मीदें।अब फैसला जनता के हाथ में है —“क्या वे दाग़दार लोकतंत्र को फिर से माफ करेंगे, या नए सवेरे की ओर कदम बढ़ाएँगे?
