₹2000 की किसान किस्त, सस्ता होता तेल और बिहार से उठते भ्रष्टाचार के सवाल: क्या योजनाओं का लाभ वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है?

बी के झा

किसान, कल्याणकारी योजनाएं और जमीनी हकीकत का राजनीतिक विश्लेषण*

NSK

नई दिल्ली/पटना, 17 जुन

एक तरफ केंद्र सरकार ने करोड़ों किसानों के लिए राहत भरी घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की 23वीं किस्त जारी करने की तारीख तय कर दी है, तो दूसरी ओर बिहार सहित कई राज्यों से यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुंच रहा है जिनके लिए ये योजनाएं बनाई गई हैं?

इसी बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी गिरावट ने देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता को नई उम्मीद दी है। यदि तेल की कीमतों में गिरावट का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचता है तो किसानों, परिवहन क्षेत्र और आम परिवारों को राहत मिल सकती है।लेकिन इन सकारात्मक संकेतों के बीच ग्रामीण भारत से उठ रही शिकायतें सरकारों, प्रशासन और राजनीतिक व्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न भी खड़े कर रही हैं।

20 जून को किसानों के खाते में आएंगे ₹2000

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत पात्र किसानों को 20 जून को 23वीं किस्त के रूप में ₹2000 की राशि सीधे उनके बैंक खातों में भेजी जाएगी।मानसून के आगमन और धान की रोपाई के मौसम के बीच यह राशि किसानों के लिए विशेष महत्व रखती है। बीज, उर्वरक, डीजल, सिंचाई और मजदूरी जैसी आवश्यकताओं के लिए यह सहायता कई छोटे और सीमांत किसानों को अस्थायी राहत प्रदान करती है।सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के लगभग 9 से 10 करोड़ किसान इस योजना से लाभान्वित होते हैं।

लेकिन बड़ा सवाल: क्या हर पात्र किसान तक पहुंच रहा है लाभ?

बिहार के मधुबनी सहित कई जिलों से समय-समय पर ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं कि पात्र लाभार्थियों के नाम सूची से गायब हैं जबकि कुछ अपात्र लोगों को लाभ मिलता रहा है।ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों का एक वर्ग आरोप लगाता है कि योजनाओं का लाभ पाने के लिए स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तियों या प्रशासनिक तंत्र तक पहुंच रखने वालों को प्राथमिकता मिल जाती है।हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन ऐसी शिकायतें यह संकेत अवश्य देती हैं कि लाभार्थी चयन प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी एवं जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है।

शिक्षाविदों की राय:

डिजिटल व्यवस्था मजबूत हुई, लेकिन अंतिम कड़ी कमजोर ग्रामीण विकास और लोक प्रशासन के विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) ने भ्रष्टाचार को काफी हद तक कम किया है।लेकिन उनका यह भी कहना है कि यदि लाभार्थी सूची तैयार करने वाली स्थानीय व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं होगी तो तकनीक भी सीमित परिणाम ही दे पाएगी।

उनके अनुसार—”समस्या दिल्ली में नीति बनाने की नहीं, बल्कि गांव तक उसके निष्पक्ष क्रियान्वयन की है।”

कानूनविदों का दृष्टिकोण: योजनाओं में पक्षपात साबित हुआ तो गंभीर अपराध

संवैधानिक मामलों के जानकारों के अनुसार यदि किसी सरकारी योजना में जानबूझकर पात्र व्यक्ति को वंचित किया जाता है अथवा अपात्र व्यक्ति को लाभ पहुंचाया जाता है तो यह केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं बल्कि भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग का मामला भी बन सकता है।कानूनविदों का कहना है कि लाभार्थी चयन में भेदभाव संविधान के समानता के सिद्धांत के विपरीत है।वे मांग करते हैं कि सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit), समयबद्ध शिकायत निवारण और स्वतंत्र जांच तंत्र को और मजबूत किया जाए।

इंदिरा आवास और अन्य योजनाओं पर भी उठे सवाल

ग्रामीण क्षेत्रों में आवास योजनाओं को लेकर भी समय-समय पर अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं।समाजसेवी संगठनों का कहना है कि कई मामलों में एक ही परिवार के कई सदस्यों को लाभ मिलने तथा वास्तविक जरूरतमंदों के छूट जाने की शिकायतें सामने आती हैं।हालांकि किसी भी विशिष्ट मामले की पुष्टि सक्षम जांच एजेंसियों द्वारा ही की जा सकती है, लेकिन सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि शिकायतें लगातार आ रही हैं तो व्यापक जांच और सार्वजनिक ऑडिट आवश्यक है।

समाजसेवी संस्थाओं की मांग: ‘कागजों में नहीं, जमीन पर दिखे विकास’

ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले कई सामाजिक संगठनों का मानना है कि योजनाओं की सफलता का आकलन केवल बजट आवंटन या लाभार्थियों की संख्या से नहीं होना चाहिए।उनके अनुसार वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि—कितने पात्र लोगों को लाभ मिला?

कितनी शिकायतों का समाधान हुआ?

कितने भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई हुई?

और योजनाओं से लोगों के जीवन में कितना वास्तविक बदलाव आया?

तेल सस्ता होने से किसानों और आम जनता को राहत की उम्मीदइसी बीच वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 16 प्रतिशत की गिरावट ने भारत जैसे आयात-निर्भर देश को राहत की उम्मीद दी है।यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार की यह नरमी लंबे समय तक बनी रहती है तो—पेट्रोल और डीजल के दाम कम हो सकते हैं,कृषि लागत घट सकती है,परिवहन खर्च कम हो सकता है,और महंगाई पर दबाव कम पड़ सकता है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इसका सबसे बड़ा लाभ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल सकता है।

भाजपा का पक्ष

भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, पीएम आवास और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं ने करोड़ों लोगों का जीवन बदला है।भाजपा नेताओं का दावा है कि डीबीटी व्यवस्था के कारण बिचौलियों की भूमिका लगभग समाप्त हो चुकी है और लाभ सीधे पात्र व्यक्ति तक पहुंच रहा है।पार्टी का तर्क है कि यदि कहीं अनियमितता है तो वह स्थानीय स्तर की समस्या हो सकती है, लेकिन इसके आधार पर पूरी योजना को विफल नहीं कहा जा सकता।

विपक्ष का पलटवार

विपक्षी दलों का कहना है कि केंद्र सरकार योजनाओं के प्रचार पर अधिक ध्यान देती है जबकि जमीनी स्तर पर निगरानी पर्याप्त नहीं है।विपक्ष का आरोप है कि कई राज्यों में लाभार्थी चयन प्रक्रिया राजनीतिक प्रभाव से प्रभावित होती है और गरीबों को योजनाओं का लाभ पाने के लिए अनावश्यक संघर्ष करना पड़ता है।उनका कहना है कि यदि सरकार वास्तव में पारदर्शिता चाहती है तो प्रत्येक योजना की स्वतंत्र सामाजिक और वित्तीय ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय: उपलब्धियां भी वास्तविक, चुनौतियां भी वास्तविक

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सच्चाई इन दोनों दावों के बीच कहीं मौजूद है।एक ओर यह तथ्य है कि केंद्र की कई योजनाओं ने करोड़ों लोगों तक सीधा लाभ पहुंचाया है और तकनीक आधारित भुगतान व्यवस्था ने पुराने भ्रष्टाचार मॉडल को काफी हद तक कमजोर किया है।दूसरी ओर यह भी उतना ही सच है कि भारत जैसे विशाल देश में स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार, पक्षपात और प्रशासनिक अनियमितताओं की शिकायतें अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।

निष्कर्ष:

असली परीक्षा घोषणा नहीं, क्रियान्वयन है20 जून को किसानों के खातों में आने वाले ₹2000 निश्चित रूप से खेती-किसानी के इस महत्वपूर्ण मौसम में राहत देंगे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ता होता तेल भी अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है।लेकिन लोकतंत्र में किसी भी सरकार की सबसे बड़ी सफलता केवल योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उनका लाभ बिना भेदभाव, बिना भ्रष्टाचार और बिना राजनीतिक प्रभाव के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।

यदि ग्रामीण भारत से उठ रही शिकायतें सही हैं तो उनका निष्पक्ष परीक्षण और समाधान आवश्यक है। और यदि शिकायतें गलत हैं तो सरकार के लिए पारदर्शी जांच के माध्यम से जनता का विश्वास मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।

क्योंकि अंततः किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली ताकत आंकड़ों में नहीं, बल्कि उस अंतिम किसान, मजदूर और गरीब परिवार के चेहरे पर दिखाई देती है जिसे योजनाओं का लाभ वास्तव में मिला हो।

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