दाऊदनगर का ऐतिहासिक दाऊद खां किला उपेक्षा का शिकार, संरक्षण की दरकार

बी के झा

औरंगाबाद (बिहार) 9 जुलाई

बिहार के औरंगाबाद जिले के दाऊदनगर स्थित दाऊद खां किला, जिसे राज्य पर्यटन विभाग ने विरासत स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया है, आज जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है। 17वीं शताब्दी में मुगल सेनापति दाऊद खां द्वारा निर्मित यह किला कभी सैन्य छावनी और प्रशासनिक केंद्र था। सोन नदी के पूर्वी तट पर स्थित इस दुर्ग की ऊंची दीवारें, बुर्ज और प्रवेश द्वार आज भी इसकी ऐतिहासिक महत्ता का प्रमाण देते हैं।

इतिहासकारों के अनुसार, दाऊद खां ने वर्ष 1663 में इस सैन्य छावनी की नींव रखी, जो लगभग एक दशक बाद पूर्ण हुई। कालांतर में किले के नाम पर ही सिलौटा-बखौरा क्षेत्र का नाम दाऊदनगर पड़ा। मुगल साम्राज्य के पतन के बाद यह धरोहर धीरे-धीरे उपेक्षा का शिकार होती गई। अतिक्रमण, ईंटों की चोरी और रखरखाव के अभाव ने इसके अधिकांश हिस्से को खंडहर में बदल दिया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि समय-समय पर इसके संरक्षण और सौंदर्यीकरण की घोषणाएं हुईं, किंतु अब तक कोई व्यापक योजना अमल में नहीं लाई जा सकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पुरातत्व एवं पर्यटन विभाग समन्वित प्रयास करें तो यह किला न केवल संरक्षित हो सकेगा, बल्कि क्षेत्र में पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई पहचान मिल सकती है।

वर्तमान में दाऊद खां किला बिहार की समृद्ध मुगलकालीन विरासत का महत्वपूर्ण अवशेष है, जिसके संरक्षण की दिशा में शीघ्र और ठोस पहल की आवश्यकता महसूस की जा रही है।दाऊदनगर का दाऊद खां किला बिहार की उन ऐतिहासिक धरोहरों में है, जिनके संरक्षण की चुनौती आज पहले से अधिक गंभीर हो चुकी है।

औरंगाबाद जिले में सोन नदी के निकट स्थित यह किला 17वीं शताब्दी में मुगल सेनापति दाऊद खां द्वारा स्थापित सैन्य छावनी का केंद्र माना जाता है। स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार, इसी दुर्ग के इर्द-गिर्द वर्तमान दाऊदनगर नगर का विकास हुआ। समय के साथ इसकी प्राचीरें, बुर्ज और अन्य संरचनाएँ क्षरण, अतिक्रमण तथा रखरखाव के अभाव से प्रभावित हुई हैं, जिससे यह धरोहर धीरे-धीरे खंडहर में परिवर्तित होती जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी ऐतिहासिक स्मारक का संरक्षण केवल अतीत को सहेजना नहीं, बल्कि स्थानीय पहचान, शिक्षा और पर्यटन की संभावनाओं को भी सुरक्षित करना है। दाऊद खां किले के व्यवस्थित सर्वेक्षण, वैज्ञानिक संरक्षण, अभिलेखीकरण तथा बुनियादी पर्यटक सुविधाओं के विकास से इसे क्षेत्र के प्रमुख विरासत स्थलों में विकसित किया जा सकता है। स्थानीय समुदाय की भागीदारी और पुरातत्व, पर्यटन तथा प्रशासनिक एजेंसियों के समन्वित प्रयास इस दिशा में निर्णायक सिद्ध हो सकते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि इस धरोहर को केवल इतिहास का अवशेष न मानकर भविष्य की सांस्कृतिक पूंजी के रूप में देखा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी बिहार की इस विरासत से परिचित हो सकें।

NSK News

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