तुर्की बन रहा है भारत विरोधियों का नया अड्डा? दिल्ली ब्लास्ट ने खोली एक नई कड़ी — कट्टरपंथ, कश्मीर और अंकारा का लिंक

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 13 नवंबर

लाल किले के पास हुए 10 नवंबर के धमाके ने देश की सुरक्षा एजेंसियों के सामने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में अब जो परतें खुल रही हैं, वे भारत के लिए एक नई चिंता लेकर आई हैं — क्या यूरोप का प्रवेशद्वार कहे जाने वाला तुर्की अब भारत विरोधी गतिविधियों का नया ठिकाना बनता जा रहा है?

दिल्ली ब्लास्ट और तुर्की कनेक्शन जांच एजेंसियों ने पाया है कि दिल्ली धमाके के पीछे जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ा एक मॉड्यूल काम कर रहा था, जिसके सूत्र तुर्की की राजधानी अंकारा तक पहुंचते हैं।इस मॉड्यूल के हैंडलर का कोडनेम “Ukasa” बताया जा रहा है, जो अंकारा से बैठे-बैठे भारत में सक्रिय आतंकियों को “Session ऐप” के ज़रिए गाइड कर रहा था।सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली धमाके के दो मुख्य आरोपी — डॉ. उमर मोहम्मद और डॉ. मुजम्मिल — कुछ महीने पहले तुर्की गए थे। जांच में उनके पासपोर्ट पर तुर्की के इमिग्रेशन की मुहर मिली है। एजेंसियां मान रही हैं कि इसी दौरे के दौरान दोनों की मुलाकात हैंडलर “Ukasa” से हुई थी, जिसने इन्हें “जिहाद” के नाम पर भड़काया और मिशन तय कराया।

तुर्की में हुआ कट्टरपंथ का “ट्रेनिंग सेशन”?जांचकर्ताओं का कहना है कि तुर्की की यात्रा के दौरान दोनों आरोपियों का “रेडिकलाइजेशन” हुआ।मार्च 2022 में दोनों ने टेलीग्राम ग्रुप्स और एन्क्रिप्टेड चैनलों से जुड़ना शुरू किया। इसके बाद तुर्की से लौटने पर उन्होंने भारत में सक्रिय मॉड्यूल तैयार किया और फरीदाबाद-सहारनपुर जैसी जगहों को ठिकाना बनाया।सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली ब्लास्ट से पहले दोनों के मोबाइल डेटा में अंकारा से कुछ कॉल्स और इंटरनेट सिग्नल्स मिले हैं, जिनकी जांच चल रही है।

तुर्की ने आरोपों से किया इनकारइन खुलासों के बाद जब भारत ने अंकारा से जवाब मांगा तो तुर्की सरकार ने किसी भी आतंकी सहयोग से साफ इनकार किया।तुर्की के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा —हम आतंकवाद के हर रूप की निंदा करते हैं। यह कहना कि तुर्की भारत विरोधी तत्वों को शरण देता है या कट्टरपंथ को बढ़ावा देता है, पूरी तरह गलत और आधारहीन है।लेकिन सवाल यह है कि जब दिल्ली ब्लास्ट के आरोपी तुर्की में हैंडलर से मिलते हैं, वहां से ऐप के ज़रिए निर्देश मिलते हैं, तो क्या ये महज़ संयोग है?

कश्मीर पर तुर्की का रवैया — भारत की चिंता का कारणतुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन लगातार कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाते रहे हैं।2019 से लेकर अब तक उन्होंने हर बड़े मंच पर पाकिस्तान का पक्ष लिया है और भारत पर “मानवाधिकार उल्लंघन” के आरोप लगाए हैं।हाल ही में संयुक्त राष्ट्र में एर्दोगन ने कहा —कश्मीर विवाद का हल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और कश्मीरी भाइयों की आकांक्षाओं के आधार पर होना चाहिए।यह बयान भारत के लिए किसी राजनयिक हस्तक्षेप से कम नहीं था।फरवरी 2025 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान एर्दोगन ने “भारत-पाकिस्तान संवाद” की बात कही, लेकिन दिल्ली ब्लास्ट के बाद उन्होंने चुप्पी साध ली —जबकि इस्लामाबाद में हुए धमाके को “आतंकी हमला” बताते हुए पाकिस्तान के समर्थन में बयान जारी किया।

तुर्की-पाकिस्तान की बढ़ती “मिलिट्री दोस्ती”भारत की चिंता सिर्फ राजनीतिक नहीं, सैन्य भी है।तुर्की और पाकिस्तान के बीच पिछले कुछ सालों में रक्षा समझौते, ड्रोन तकनीक और नौसेना सहयोग बढ़ा है।ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की के Bayraktar TB2 ड्रोन और Songar UAVs पाकिस्तान को मिले।इसके अलावा तुर्की ने MILGEM कोरवेट्स और C-130 विमान भी पाकिस्तान को ट्रांसफर किए हैं, जो भारत की सीमा से सटे इलाकों में तैनात हैं।यानी तुर्की सिर्फ पाकिस्तान का “राजनयिक दोस्त” नहीं, बल्कि “सैन्य साझेदार” भी बन चुका है — और यही भारत की सुरक्षा एजेंसियों की सबसे बड़ी चिंता है।

भारत की रणनीति — “मौन नहीं, जवाब”भारत ने तुर्की के इस रुख का जवाब देने के लिए अपने कूटनीतिक मोर्चे पर तेजी लाई है।विदेश मंत्रालय ने एर्दोगन के बयानों को “अस्वीकार्य” बताया और कहा कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है।भारत अब तुर्की के क्षेत्रीय विरोधियों — ग्रीस, इज़राइल और आर्मेनिया — के साथ अपने रक्षा और कूटनीतिक रिश्ते मज़बूत कर रहा है।रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह एक “काउंटर-बैलेंस” पॉलिसी है, ताकि तुर्की और पाकिस्तान के बढ़ते गठजोड़ को चुनौती दी जा सके।

निष्कर्ष

दिल्ली ब्लास्ट ने भारत के सामने एक नया सवाल खड़ा किया है —क्या अब तुर्की भी पाकिस्तान की तरह भारत विरोधी ताकतों का “सेफ हब” बनता जा रहा है?जांच अभी जारी है, लेकिन शुरुआती संकेत साफ हैं —भारत के खिलाफ साजिश का “नक्शा” अब दक्षिण एशिया से आगे बढ़कर तुर्की की राजधानी अंकारा तक पहुंच चुका है।

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